Tuesday, September 2, 2014

----- ॥ सोपान-पथ १९ ॥ -----

सोमवार, १ सितम्बर, २०१४                                                                                                   

एक कर माल दुजन कर पूछी । नारि कंप कहुँ  होइ न छूछी ॥ 
राम राम कर दिवस निकासे । गुनत गिनत लै एक एक साँसे ॥ 
 एक  कर की माला दूसरे कर को पूछती तुम कहीं नाड़ी कम्पन से रक्त तो नहीं हो ॥ इस प्रकार  एक एक स्वांस का गुणन एवं का गणन करते राम राम कर दिन निकल रहे थे ॥ 

 सूत कोस किए   उर दिए  टाँके । सूखत सूत सूत हो  झाँके ॥ 
जीवद जस निर्देसन दाईं ।  धरे सूचि तस मात चलाईं  ॥ 
सूत्र-गाँठ दिए ह्रदय को आबद्ध किया गया था  । वह सूत्र-सूत्र होकर शुष्क हो चला था ॥ चिकित्सक द्वारा जैसा निर्देश दिया गया सूचि धारण किए माता पुत्र को उसका अक्षरश: अनुशरण करवाती ॥ 

एक दिवा बधुटी पूछ देखे । ते लच्छन पहिले कभु पेखे ॥ 
सो अवसर जस उर आनेई । हहरत गतिबत पीरा देई ॥ 
तदननतर एक दिन वधु ने प्रीतम से प्रश्न किया । उन लक्षणों को तुमने पहले कभी संज्ञान में लिया था जो उस समय तुम्हारे ह्रदय ने कंपकपाते हुवे गतिवन्त स्वरूप पीड़ा देते हुवे प्रस्तुत किये थे ॥ 

बोले पिया बिगत एक मासा । जब मैं चरउँ भरि उर साँसा ॥ 
श्रमित देहि कह कंठ प्यासे । तनिक बिश्रामत हरे हरासे ।। 
वधु के पतिदेव  ने प्रतिभाषण में कहा ह्रदय घात के पूर्व विगत एक मास से जब मैं चलायमान होता  तब हृदय स्वास से भर जाता । देह शिथिल होकर कंठ के तृष्णित होने की सूचना देती । किंचित समय का विश्राम उस शिथिलता को हर लेता ॥ 

जब रहे ऐसेउ दसा,  कहे को काहु नाहि । 
सधारन बचन सोच के, मम मुख मौन धराहि ।। 
जब ऐसी दशा प्रकट हो रही थी तब किसी से कुछ क्यों नहीं कहा (वधु ने प्रतिप्रश्न किया ) । साधारण सी बात है ऐसा विचार कर मेरे मुख पर  मौन विराजमान रहा ॥  

मंगलवार ०२ सितम्बर, २०१४                                                                                             

भली भय पिय जुगि सेउकाई । चिंता रहि न कछु गृह के ताईं ॥ 
न तरु कतहुँ जो किए बनिहारे । जीवन धन दृग चितबत हारे ॥ 
अच्छा हुवा की प्रियतम सेवारत थे गृह के प्रति  कुछ चिंता नहीं थी ॥ अन्यथा कहीं बनिहारी होते तब गृह आधार भूत द्रव्यों की प्रतीक्षा ही करता रहता ॥ 

मिलए कर सिद्धि प्रति एक  मासा । गृहस बाहिनी चलै सुपासा ॥ 
बहुरि एक दिवस भसुर अवाईं । कुसल छेम सब पूछ बुझाईं ॥ 
प्रत्येक मास हस्त सिद्धि प्राप्त हो जाती । जिससे गृहस्थी का रथ सुखपूर्वक संचारित होता रहा  ॥ फिर एक दिन वधु के ज्येष्ठ का गृहागमन हुवा । उन्होंने सबकी कुशलता पूछी ॥ 

देखि भ्रात गति अकथ अतीवा । निज सों डरपत भए जड़ जीवा ॥ 
कहि दुखित भए अधमि रे भाया । कहँ प्रथमहिं अरु कहँ एहि काया ॥ 
सानुज की अत्यंत अनिर्वचनीय दशा देखकर वह  स्वयं के प्रति भयाकुल  होते हुवे एवं जड़ जीव स्वरूप हो गए ॥ दुखित होकर कहने लगे रे भैया तुम तो आधे हो गए । कहाँ आघात पूर्व की काया और कहाँ  यह ॥ 

अस कस जीवन रथ संचारिहि । घायल पद पथ लमनि अपारहि ॥  
होत जात तुअ सेउ बिजोगे । सेवा सो तो आपहि जोगे ॥
जीवन रथ ऐसे कैसे संचालित होगा । पंथ  लंबवान है, अपार है और चरण घायल हैं । पुत्र के होते हुवे भी तुम पुत्र  की सुश्रुता से वियुक्त हो  भी ।  है सो  अपनी ही सेवा की प्रतीक्षा किया करता है  ॥ 

कहत पिया बहु होत दुखि, अरु ए अकथ घर गाथ । 
हे भ्रात मात सह मोहि चलउ लेइ निज साथ  ॥ 
तब प्रियतम अतिशय दुखित स्वर में बोले : - और यह घर की अकथ गाथा । हे भाई !  तुम मुझे माता सहित अपने संग ले चलो ॥ 

बुधवार, ०३ सितम्बर, २०१४                                                                                                 

लखत लहुरा त लागिहि साथा । परत दुबिधा माथ धरि हाथा ॥ 
अरु को निगदन मुख नहि आवा । रच बचन ऐसेउ समुझावा ॥ 

बरे न दीपक बरतिक हीना । पूछि न को दिनु रयन बिहीना ॥ 

बिनहि बसन तन धन बिनु दीना । धरा गगन रबि किरन अधीना ॥ 

खड्ग कोष बिनु बन निषंगा । तरनि तोए बिनु तीर तरंगा ॥ 

ताल पताः बिनु गायन रागा । नायः लखन बिनु लगन नुरागा ॥ 

गेही गेहस जोगनहारी । कहत सुजन तस नर हुँत नारी ॥ 

बड़के भ्रात कहत सकुचाहीं । नारि बनु का धरे जग माही ॥ 

सुबरन जस बन भूषन सोहा । पाँसल हल बन सोहत लोहा ॥ 
बालक पालक पोषन  करता । सोहत तसहि पुरुख बन भरता ॥ 

यह मायिक जगत प्रपंच, बिध ऐसेउ रचाहि  । 
नारि नर संजोग बिनु, जीवन जड़ हो जाहि ।। 

बृहस्पतिवार, ०४ सितम्बर, २०१४                                                                                           

देस काल अवसर अनुहारी । बड़के दिए सुठि सीख बिचारी ॥ 
माँग कतहुँ सो मिले न भीख । बिनहि माँगत  दाए अस सीखा ॥

तुम सब उचित कहिहु रे भाई । तुहरे कथन नुहरन भलाई ॥ 
ज्ञान बचन तव मंगल मूला । तुम पथ दर्सक मैं पथ भूला ॥ 

धरि पिय सिरु पद पदुम परागा । सानुज हेतु उमगि अनुरागा ॥  
कर धरे पुनि चारि घरि होरी  । दे आसीस चरन बहोरी ॥ 

हृदय अंतर सूत्र कोष, किछु दिन पीरा घारि । 
जीवद निरखाउत सतत, हरि हरि भए भय हारि ॥ 

शनिवार, ०६ सितम्बर, २०१४                                                                                                     

किछुक दिन माहि भए बैकर तन । कार भवन पुनि लागिहि जावन ॥ 
जननी चारि मास लग होरी । अजहूँ  अवसरु  आन बहोरी ॥ 

सुत हुँत रागि कंठ भर लाई । रहिहहु सकुसल कह समुझाई ॥ 
अलप बयस संताप घनेरे । जब मन लगि तब आने घेरे ॥ 

लोचन भरी आँचर सिरु धरी । बहु प्रकार बधु पदुम पद परी ॥ 
दाइ असीस पबित  मन संगा । बधुरी तव अहिबात अभंगा ॥ 

अरु कहि कबि कोबिद कृत कबिता । लिखी कहे पभु मानस चरिता ॥ 
धीरज धरम मित्र  अरु नारी । आपद काल परिखिअहि चारी ॥ 

बिरध रोग बस जड़ धन हीना । अंध बधिर क्रोधिहि अति दीना ॥ 
ऐसेउ पति कर किए अपमाना । नारि पाउ जमपुर दुःख नाना ॥ 

मन सों काया बचन सों, रहे पति चरन प्रेम । 
एकै धरम ब्रत नारि हुँत, अहइँ यह एकै नेम ॥  











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