Monday, June 16, 2014

----- ॥ सोपान पथ १६॥ -----

गवन धिअ नित बिद्या निकाई । एक रछित बाहि आन लवाई ।। 
लेइ बनाए बनाउनहारी । अजहुँ बहुस सुठि अली प्यारी ॥
धीआ प्रतिदिन विद्यालय जाती । एक सर्व सुरक्षित वाहनी उस लेने आती ॥   बनाने वाली ने अब तक बहुंत सी सुन्दर वाम प्यारी सखिया बना ली थीं ॥  

धनुगुन निकसत सर के नाई । एक दिन पढ़ जब धावत आई ॥ 
चढ़े बाहु अंतर हिन्दोली । ओदन मुख धर तोतरि बोली ॥ 
 धनुष की म्पत्यांचा से छूटे तीर के जैसे एक दिन वह पढ़कर दौड़ते हुव घर आई ॥ और जननी की गोद के हिंडोेले लेती हुई मुख में भात रखे तोतली भाषा में बोली ॥ 

जगत न्यारिहि हे री माई । मोरि सखी जे भेद बताई ॥ 
ऊँच चौंक जो करे बिश्रामा । सनगनक जिन साधनक नामा ॥ 
जगत से न्यारी हे री  मैया मेरी सखियों ने मुझे एक रहस्य वाली बात बताई है ॥ यह उपकरण जिसका नाम संगणक है,  जो ऊंची चौकी पर विराजित होकर विश्राम कर रहा है ॥ 

तिन्हनि मम पितु कहँ सों लाने । जेहि बिचित्र बहु दिब्य बिमाने ।। 
ते उपकरन उपजोग अधिका । करवावहै जे संगत संगनिका ॥ 
से मेरे पिता कहाँ से लाए थे ? यह बहुंत ही विचित्र एवं दिव्य विमान है (ऐसा सखियों ने मुझे कहा )॥ इस साधनक का उपयोग बहुंत अधिक है जो हम नहीं कर रहे हैं । यह संसार सहित समाज से संगती करवाता है  ॥ 

नवल बोध नउ जानपन, दिए जो सखिहि सुजान । 
अजहुँ लही धिए लघु बयस, पर जननी दिए ज्ञान  ॥ 
 यह नई बुद्धि नई जानकारी जो धिया को उसकी सखियों ने दी थी । अभी जिसने  लघु अवस्था ही प्राप्त की थी किन्तु जननी को वह बड़े के जैसे ज्ञान दे गई ॥ 

मंगलवार, १७ जून, २०१४                                                                                               

एहि कहत बधु मन सुख मानी । हमारी बिटिया भई सयानी ॥ 
जिन्हनि जननी जनक न जाने ।  जानपनी सो  ज्ञान बखाने ॥ 
हमरी बिटिया अभी से बड़ी हो गई यह  कहते हुवे वधु ने अपने मन में बहुंत ही सुख माना ।  जिस ज्ञान को जननी और जनक नहीं जानते थे । उस ज्ञान का वह बिटिया बड़ी चतुराई पूर्वक  व्याख्यान कर रही है ॥ 

पुचुकारत जनि रागित गाला । सँवारत सिरु लट परे भाला ॥ 
अँकवारी अस उतरुहु देई । ते साधन पितु मोलक लेई ॥ 
उसके कोमल एवं अनुरागित कपोलों को पुचकारते हुवे भाल पर पड़ी हुई केश गुच्छ को  शीश पर संवारकर । गोद में बैठी  बिटिया को माता ने ऐसे उत्तर दिया । कहाँ से लाए का क्या अर्थ है ? कार्यालय से थोड़े ही उठा के लाए हैं यह साधनक तुम्हारे पिता मोल लाए थे ॥ 

जब मैं बोलि जेइ का लाने । कहे बहु बिचत्र दिब्य बिमाने ॥ 
पहलै एक  रथ बाहिर ठाढ़े । सोचि तव जनि जान अरु बाढ़े ॥ 
जब मैने कहा ये क्या ले आए तब वे बोले यह बड़ा ही विचित्र एवम दिव्य विमान है पुष्पक है पुष्पक ॥ तुम्हारी माता ने सोचा पहले ही एक रथ घर के बाहिर खड़ा है अब यह पुष्पक और बढ़ गया ॥ 

रह पूरन तब नगर निबासी  । आन कही तव प्रिय संकासी ॥
तेहि जान हमहू संचारीं ।  जे दुर्भरति दीर्घाहारी ॥ 
उस समय  हम पुराने नगर में निवासरत थे पुराने नगर में निवासरत थे तब तुम्हारी प्रिय संकासिनी ने आकर कहा : -- इस यान को हम भी संचालित कर चुके हैं यह तो बहुंत ही दुर्भर एवं पेटू है तुम लोग नहीं चला पाओगे ॥ 

 सुनत संकासिनि सद बचन, हेरि ऊँच आधार  । 
तापर तिन पौढ़ाइ के, दिए मुख पट ओहार ॥ 
उस संकासिनी की ज्ञान युक्त वचन सुनकर तुम्हारी माता ने एक ऊंचा आधार ढूंढा । और इस साधनक के मुख पर आवरण से ढककर उसपर इसे सुला दिया ॥ ( उस समय से यह ऐसे ही विश्राम कर रहा है ) ॥ 

बुधवार, १८ जून,२०१४                                                                                                            

मति बिनु मत गति बिनु आहारे । एक बहि बाहिर एक भित ठारे ॥ 
बाहि गतागत  हेतुक  हेरे । तव जनि अंतर बैसत खेरे ॥ 
बुद्धि के बिना विचार नहीं आते और आहार के बिना संचरण नहीं होता । आहारहीन होकर यातायात का एक साधन  घर के बाहर अवस्थित था एक घर के भीतर ॥ 

आन बसे अब नबल नबोकस । नभग के नभग रहे नभोकस ॥ 
भिते श्रुतत पिय बचन धिआ के । चपलइ धी गहि गो पिता के ॥ 
अब तो नवा ओकस् में भ हम आ गए । किन्तु यह विहंग भाग्यहीन का भाग्यहीन ही रहा ॥ गृह में परवश करते हुवे जब प्रियतम ने धीआ की बातें सुनी । तब धिया चपलता पूर्वक अपने पिता की गोद में जा बैठी  ॥ 

करिहउँ संगत सखी सों निका । बाल मानस किए रगर अधिका ॥ 
पितु  प्रिय धिए हठ पूर्ण कारे । नभोचर उदर भोजन  घारे ॥ 
मुझे अपनी सखियों के समाज संग संगती करनी है । उसकी बाल बुद्धि ने हठ ही पकड़ ली ॥ तब पिता ने  प्रिय तनुभवा की हठ को पूर्ण करते हुवे उस गगनचर के उदर को भोजन से तृप्त कर दिया ॥ 

चारि जान भर भूसन भेसे । पहिले आपन नाउ प्रबेसे ॥ 
बैठि भीत अस धिअ दिए हेली। हेर हिरानइ हेलिन मेली ॥ 
अब वह संचरण हेतु तैयार था सर्वप्रथम उसने अपना नाम की प्रविष्ट की फिर तो वह सुन्दर सुन्दर भेष और आभूषण धारण कर उस बेमान में विचरने लगी ॥ भीतर बैठी धीआ ने ऐसी पुकार लगाई कि उसकी  विलुप्त प्राय एवं  विस्मृत हो चुकी सखियों ने भी उसे ढूंढकर सस्नेह मिलन किया ॥ 

 संगती संगनिका प्रति, जनि मन संसय होइ । 
जहँ गुन अवसि तहँ दोषहु होहिहि कोइ न कोइ ॥ 
इस सामाजिक संगती-फंगति के प्रति माता के मनो-मस्तिष्क में कन्चित संशय हुवा । ( उसने सोचा) यदि इस साधन यदि गुण  की वह घर बैठे सूचनाओं का आदान-प्रदान करने में सक्षम है तो कोई न कोई दोष भी अवश्य ही होगा ॥  

बृहस्पतिवार, १९ जून, २०१४                                                                                               

देवनहारे दिए निर्देसे । जुगता धारिहि खेत प्रबेसे ॥ 
दिए बयस सींव धिआ न गाही । ए कर जननि पथ दरसत जाही ॥ 
देने वाले ने आवश्यक निर्दश दिए थे योग्यता धारी ही इस सीमा बद्ध स्थान में प्रवेश करें । पुत्रिका ने दी गई आयु सीमा प्राप्त नहीं की थी ॥ इस कारण जननी  उसका पथ प्रदर्शन करती जाती ॥ 

बिद्या भवन सौं आवइ घर  । श्रम हारत चढ़ेउ ता ऊपर ॥
कौतूहल बस गगन बिहारे । सोइ खेत सन जननी चारे ॥ 
जब वह विद्यालय से जब घर लौटती तब अपनी थकान मिटाकर उस यान पर आरोहित हो जाती ॥ और कौतुहल वश गगन में विहार करने लगती । उस संगोष्ठी क्षेत्र में प्रवेश करते समय जननी उसके साथ रहती॥ 

जानै  कहुँ जनि बुद्धि बिसेखे  । दीठी भर भर चहुँ पुर देखे  ॥। 
को बिरदैत कपटी भेसा । को भोगी जटा  जुट केसा ॥ 
उस क्षेत्र की विशेष बुद्धि को परीक्षार्थ हेतु जननी अपनी दृष्टि को विस्तार देकर चारों और देखा करती ॥ वहां कोई बड़े नामवाला था जो कपटी वष धारण किए हुवे था कोई भोगी था जो जटाओं और जूट के सदृश्य केश रखे हुवे था ॥ 

बिरध बाल बन बालक बिरधा । दिवस राति कँह गरल कँह सुधा ॥ 
को भाँति भाँति के रूप धरे । छली जग छलन कोउ नर हरे ॥ 
वृद्ध वहां बालक हो गए थे बालक वृद्ध जो दिवस को रात कहते विष को अमृत कहते अर्थात ज्ञान से कच्चे थे ॥ कोई विभिन्न प्रकार के वेश धरे हुवे था । कोई छलिन था जो जग को छलने के लिए नर हरि बना हुवा था ॥ 

लिखि कुंजर को मसक समाने । मूसक निज बन केसरि माने ॥ 
 नर नारी नारी नर होई  नर कि नारी चिन्ह न कोई ।॥ 
कोई मच्छर था जो स्वयं को हाथी समझता था । और कोई अपने आप को वनराज कहता था था वो मूसक ही ॥ जो सम्मुख है वह नर है कि नारी  है यह रहस्य ही रहता । अर्थात यहां नर  नारी  नारी नर का रूप धारण किए हुवे था । सार यह है कि यहां बाह्य काया निर्गुण स्वरूप में एवं अंतरमन सगुण स्वरूप में था ॥ 

बेमान दिखाए बधु पुनि भाँति भाँति के देस । 
बैस निबासी भर जहाँ, आनि बानि के भेस ॥ 
उस विमान ने वधु को भाँती भांति के संगोष्ठी क्षेत्र दर्शाए । जहां इस भू लोक के निवासी विभिन्न प्रकार के वेश भरे बैठे दखाई देते ॥ 

शुक्रवार, २० जून, २०१४                                                                                                

भू कंटक कहुँ सेल बिसाला । कूप बाँपि के पड़े अकाला ॥ 
जान देइ आयसु सिरु धारे । कहत गत सोइ देस उतारे ॥ 
कहीं कंटक युक्त भूमि खंड कहीं  बड़े बड़े पत्थर थे । कूप बावली का तो अकाल था । विमान, चालक की आज्ञा सिरोधार्य करता । चालाक जहां कहता वह उसी देश में उतार देता ॥ 

ज्ञान नयन सद बचन प्यासे । भूरि घन बन न मिलै सकासे  ॥ 
कबहु मत घन गगन मन घेरहि । बरखन गिर बन कानन हेरहि । 
ज्ञान के चक्षु  सद्वचनों की तृष्णा थी  । घने वन ने उसे अवगुंठित किये हुवे था वह  निकट कहीं दृष्टि गत नहीं हो  रहा था ॥ कभी जब विचारों के घन चित के गगन को घेर लेते । फिर  वर्षण हेतु किसी सुदेश की निरूपण में लग जाते ॥ 

नवल पथिक पथ बहुस प्रकारे । जानइ पुरनइ जाननिहारे ॥ 
कबहु जान जब लिए आबरतन । बहुरे पथिक निज बासि सदन ॥ 
पथिक नए थे पथ बहुंत प्रकार के थे जिन्हें पुराने जानने वाले ही जानते ॥ । जब कभी विमान  भंवरी लेने लगता तब पथिक भयवश अपने निवासित सदन में लौट आते ॥ 

 बिरति रयन जब नवल बिहाने  । चढ़े जान पुनि पाख बिताने ॥ 
तनु भवा संग सखी समाजे । किए संगत निज भवन बिराजे ॥ 
रयनी का अवसान होता और नवल विहान होता तब यात्री पूण: उस पुष्पक विमान पर विराजित होकर उसके पंख विस्तारित कर देते ॥ पुत्रिका अपने भवन में ही विराजित होकर अपनी सखी मंडली के संग संगती करती ॥ 

जननि तेहि चेताबत चेते । अपरचन मिलत करे न हेते ॥ 
जननी उसे चेतावनी देते हुवे सावधान करती कि  यहां अपरिचित के संग मित्रता मति करियो । 

अहबानी सगात रूप जब लग लेइ न जान । 
चाहे मित बधाउन को, केतक दे अहबान ।।  
जब तक उस आह्वानी से सशरीर स्वरूप में परिचय न हो जाएं ॥चाहे वह सखिता हेतु कितना भी आह्वान करे ॥  

शनिवार, २१ जून, २०१४                                                                                                       

एक दिन एक सन गोठी खेहा । संकोचित चित सहित सनेहा ।\ 
गोठ करन बधु ठिआ रचाई । नाउ धरत दुइ गोठ गठाई ॥ 
एक दिन एक संगोष्ठी क्षेत्र में संकोचित चित्त से स्नेह सहित वार्तालाप करने हेतु वधु ने भी एक डेरा रचा । और अपना नामांकन कर दो बात गाँठ बाँधी ॥ 

 दिए खाँच बीच निज चित्र दाने । अह्वानत सखि पंथ जुहाने ॥ 
धिआ सखि बहु संख्यक होई । बधु सन सखिता बधे न कोई ॥ 
दिए गए खांचे के मध्य चित्र भी चित दिया ॥ और केवल वार्तालाप के हेतु किसी सखी की प्रतीक्षा करने लगी ॥ धीआ की मित्र बहु संख्यी हो चले थे । वधु के संग कोई मित्रता स्थापित नहीं करता ॥ 

ठोर ठोर प्रति बधु करि सोधा । देखी जहँ तहँ पथिक प्रबोधा ॥ 
कारभवन को नगर निबासे । को निज आँगन बैठ सुपासे ।। 
फिर वह प्रत्येक स्थान का अन्वेषण करने लगी ।  उसने जहाँ तहाँ प्रबुद्ध पथिकों को देखा ॥ कोई कार्यायल  कोई नगर में कोई  निवास में और कोई अपने  आँगन में सुखपूर्वक विराजित हो कर मैत्री किए॥ 

बृहद निकर को लघु समुदाया । हेलत हेतत् करहि मिताया ॥ 
जे नहि मित्र दुःख होहि दुखारी । तिन्हनि लोकत पातक भारी ॥  
कोई वृहद समूह में कोई लघु समुदाय में हेल-मेल करते हुवे मित्रता कर रहे थे ॥ जो मित्र अपने मित्र के दुःख में दुखित न हो  । धर्म एवं नीति के विरुद्ध किए जाने वाला आचरण उनकी प्रतीक्षा करता है ॥ 

बरे अग्यान होत पतंगा । दीप सिखा ग्यान सत्संगा ॥ 
जो को जन दुरसंगत कीन्हि । जग लग कुल कज्जल सम चीन्हि ॥ 
ज्ञान की सत्संगी दीप शिखा में ज्ञान रूपी पतंगा जा कर भस्म हो जाता है ॥ यदि कोई कुसंगति करता है,  उसका परिचय संसार भर में कुल कलंक के सदृश्य  होता है ॥ 

कुसंगी सोंह कोइरी, राजा हो की रंक । 
बरता करतल बार दे, बुझता देइ कलंक ॥   
कुसंगी चाहे राजा हो अथवा रंक वह कोयला के समतुल्य  है । उसका सम्बद्ध जाते हुवे कोयले के सदृश्य हथेली को जला देता है एवं सम्बन्ध विच्छेदन उसे कलंकित कर देता है ॥

रवि/सोम, २२/२३ जून, २०१४                                                                                                          

यह चितबन् चिद् गगन अवासा । अंतर बाहिर करत बिलासा ।। 
जाके लोचन ज्ञान बिबेका । दोइ पलक पट नाउ अनेका ॥ 
यह चित्त यह चित्त शुद्ध ज्ञान स्वरूपी ब्रह्म का आवास है । यह अंतर बाहिर दोनों स्थानों में रमण करता है ॥ ज्ञान और विवेक ही इसके नेत्र ( गवाक्ष ) हैं । इस नेत्र के दो पलक रूपी आवरण हैं जिसके अनेकों नाम है; दुर्बुद्धि, मंदमति आदि ॥ 

भाग अभाग भेद भय भ्रांति । भूख प्यास अलक के पांति ॥ 
दुर्भेवाग्रह उक्ति दुरासा । दुर्नय अन्वय किए प्रत्यासा ॥ 
भाग्य, अभाग्य, रहस्य, भय, भ्रान्ति, क्षुधा, तृष्णा आदि इस पलक की अलकावली हैं  ॥ यह आशंकाऐं दुराग्रह, बुरी युक्तियाँ, बुरी आशाएं अविनय, बुरे निष्कर्ष  की प्रत्याशा में रहता है ॥ 

हर्ष सोक इहाँ के निबासी  । काम क्रोध जहँ कारावासी  ॥ 
सम दम संजुग सद आचारा । दया कृपा सत राख दुआरा ॥ 
हर्ष शोक ताप आदि विषय यहां के निवासी हैं  । काम क्रोध मद लोभ जहां कारावासी हैं  ॥ समानता, संयम,सदाचार धर्म के चार चरण  इसके द्वार रक्षक  है  ॥ 

गुन गात सुधात ज्ञान ज्ञाता । सस रैन सुधात रबि प्रभाता ।। 
सुध्युपासय अगजग सुधाता । सुधात बिनु सब होत उत्पाता । ॥ 
गुण, गात्र को सुवस्थित करता है शशी रयन की व्यवस्थापिका है सूर्य प्रभात का व्यवस्थापक है ॥ ईश्वर समस्त संसार का व्यवस्थापक है । व्यवस्थापक के  बिना अर्थात ईश्वर पर अविश्वास के कारण समस्त उत्पातों कारण हैं ॥ 

उर बिनु पाँख चरै बिनु चरना । तन बिनु परस श्रुतत बिनु करना ॥ 
आनन रहित सकल रस भोगी । बिनु बानी बकता बर जोगी ॥ 
यह चित्त बिन पंख के ही उड़ान भरता है बिना चरण के गतिवान रहता है । यह त्वचारहित है तथापि  स्पर्श अनुभव  करता है कारण रहित है तथापि श्रवण करने में सक्षम है ॥ 

रसन रहित सब रसनी रसिका । गहने बास सब रहित नसिका ॥ 
बनु कर करम करै बिधि नाना । देह रहित पर देहि समाना ॥ 
यह रसना हीन है तथापि सभी रसों का आस्वादन करता है । यह नासिका रहित है  तथापि सभी गंधों का ग्राही है । यह हस्तहीन  है तथापि विविध प्रकार के कार्य क्रियान्वित करता है । सारांश में यह देह रहित है किन्तु देह धारियों  के सदृश्य है ॥ 

मन राग सब राग है, मन लागे सब लाग । 
मन जागे सब जाग है, मन धागे सब धाग ॥  
चित्त के अनुरागित होने से ही सभी रागों का अस्तित्व है । मन में  द्वेष होने से ही, द्वेष का अस्तित्व है । चित्त के विवेक की जागृत वास्तविक जागरण है । चित्त के सूत्र में सभी इन्द्रियों के सूत्र आबद्ध हैं अत: यह एक सूत्रधार भी है ॥ 

काम भाव गति मनस सुभावा ।  लहे  अनुभूति कृत उद्भावा ॥ 
अलख रूप धन बरन सनेहा । भाव सील सथ परम  उरेहा ॥  
अभिाषाएं, विचार और परिचारण यह मनोमस्तिष्क का स्वभाव है वह कल्पना कर उससे अनुभूति प्राप्त करता है ॥ यह अदृशय है रूप सम्पदा एवं वर्णों का स्नेही है । यह भावों से भरा हुवा एवं उसके लय में लीन एक परम चित्रकार है ॥ 

जिए जीवन उरेह रखि लाखे । जिन्ह न जिए तिन्हनि लिख राखे ॥ 
अपलक नैन पलक पट ढारे । चह जब दरसत दरसनहारे ॥ 
जितना जीवन जी लिया गया उसके उसके जाने कितने चित्र  चित्रांकित किए रखता है । जिस जीवन को नहीं जिया  चित्रीकरण करता है  ॥ 

भूतबता को  होइ नहोई । एहि चितेरा सकल लिख जोई ॥ 
 होतबता को होवनि हारे। चितेरु पहलेही लिख धारे ।  
कोई भूतव्यता  हुई हो अथवा न हुई हो  । यह  चित्रकार सभी कुछ चित्रित कर संकलित रखता है ॥ कोई भवितव्यता होने वाली हो यह चित्रकार उसका पूर्वानुमान कर  प्रकल्पित कर लेता है ॥ 

यह बादिक मन परम लिखेरा । जान केत सुमिरन  लिख केरा ॥ 
बिरत काल जहँ कहँ कछु देखा । सुरत सकल झट मति पट लेखा ॥ 
यह वाचाल चित्त एक परम लेखक हा । इसने जाने कितने संस्मरण लिख रखे हैं । बीते काल में जहां कहीं कुछ देखा उसे स्मरण कर इसने तत्काल ही चित्त के पट में उल्लखित कर दिया ॥ 

मन महा गनक महा कबि, मन महा कहनि कार । 
कहूँ कथित कृत कल्पना, कहुँ कह होत निहार ॥ 
यह चित्त महा लेखापाल महा कवि है यह चित्त एक महा कथा कार भी है । कहीं यह कल्पनाएं रचित कर कथा  करता है कहीं अकल्पनीय को देखकर कथन करता है ॥ 

मंगलवार, २४ जून, २०१४                                                                                                    

चितबन् जब कोउ कथन गठिते । कल्पना त्वरित चरित रचिते ॥ 
कृत कृति चित छिति जुगत जुगाहे । गढे कथा कहुँ कहनइ चाहे ॥ 
चितवन जब कोई कथन गठित करता है कल्पना  तत्काल ही उस कथा के चरित्र की रचना कर देती है ॥ तब कृत एवं कृतियाँ चित्त के क्षितिज पर युक्तियाँ संकलित करती है ॥ और गढ़ी हुई कथाएं  कहीं कहने की अभिलाषा में रहती हैं ॥ 

भाव ब्यंजन साधन बानी । सह भंगिमन  गहै सब प्रानी ॥ 
भाषा साधन बिधि मनु  दाने । बुद्धि उपजोग दिए बरदाने ॥ 
भाव के अभिव्यंजन का साधन है वाणी , संग में भंगिमाएं । भाव भंगिमाएं विधि ने सभी प्राणियों को प्रदत्त किया है ॥  मनुष्य को जो भाषा का साधन प्रदान किया वह बुद्धि के उपयोग हेतु जैसे उसे वरदान सिद्ध हुई ॥ 

 रसना धनु बानी गुन माने । धुनी बान संधान बिताने ॥ 
जब करन रंध्र लख बीथि  चरे । सीध बँधे तो हरिदै उतरे ॥ 
जिह्वा यदि धनुष है तो वाणी प्रत्यंचा । जिसमें शब्द के बाण संधान कर यदि प्रस्तारित कर जब यह कर्ण रंध्र की लक्ष्य वीथी पर चलता है तब यदि सीध बंधा हो तो यह सीधे हृदय में उतरता है ॥ 

बधु चितहु रचे बहु उद्भावा । सुठि साधन बिनु कहन न आवा ॥ 
धुनी बरन बिनु गई न बखानी । अपरचन रहे मसि पथ धानी ॥ 
वधु के चित्त ने भी बहुंत सी कल्पनाए थी । किन्तु उत्तम साधन से रहित वह चित्त अपनी कल्पनाओं को उद्भाषित करने में असमर्थ था ॥ शब्द एवं वर्ण हीनता के कारण वह कल्पित कथन  कहीं कहे नहीं गए । इस प्रकार चित्त की लेखनी मसि धानी से भी अपरिचित ही रही ॥ 

जब सों गयउ बालकपन, गढे बहुतहि  कहाइ । 
प्रेरण लगन बिनु साधन, लिखेरन नहीं आइ ॥ 
जब से बचपन व्यतीत हुवा तब से चित्त ने बहुंत सी कहानियां  गढ़ी । प्रेरणा, लगन एवं साधन से रहित होकर अंतर भावों की कहीं व्यंजना नहीं हो सकी ॥ 

बुधवार, २५ जून, २०१४                                                                                                        

ते अवसर मन मनस अगासे ।  चरित्र गठित कछु कथा न्यासे ।। 
कल्पना कृत कथन क्रम जोगे । कहनि चरन पत्र पंथ बिजोगे ॥ 
उस समय मन मानस के आकाश में चरित्र  का गठन किए कुछ कथाएँ न्यासित थी । कल्पनाओं ने कथन के क्रम को संयोजित किया हुवा था । किन्तु उसके चरण पत्र के पंथ से वियोजित थे ॥ 

करत चित्रित एक चरित नाइका । जासु रचित संभृतभूमिका ॥ 

जोइ रहे एक चिकित्सिका ॥  लवंग कलिका लवन लसनिका ॥ 
यह कथा  एक चरित्र नायिका का चित्रण करती । जसमें उस चरित्र की  केंद्रीय भूमिका थी  ॥ वह चरित्र नायिका लवंग लतिका स्वरुप में एक लावण्य श्री चिकित्सिका थी ॥ 

कल केस रचित लमनी लसना । कमल नयन पूरन निभ बदना ॥ 

पुनि एक दिवस बैस  बैमाना । प्रचर चरन बधु  पांख बिताने ॥ 
उसके  केश सुरुचि पूर्ण होकर लम्बे एवं आकर्षक थे । नयन कमलिन होकर मुख पूर्ण चन्द्रमा के सदृश्य प्रतीत होता ॥ फिर एक दिन विमान में आरोहित हो  पंख को विस्तार दिए  वधु गगन वीथी में विहार कर रही थी ॥ 

चित प्रेरित सिरु लागि अकासा । परसत चरी मरुत उन्चासा ॥
गोठी खेह जब दिए दिखाई । खाँच खचित सब करत मिताई ॥ 
उनचास प्रकार की वायु के स्पर्श प्राप्त कर चित्त से वह ऐसी प्रेरित हुई कि उसका सिर आकाश से जा लगा और बहुंत दुखा । उसे जब वहां से फिर वही संगोष्ठी क्षेत्र दिखाई दिया जहां खाँचो में खचित होकर पुर्ववत सब मित्रता करने में व्यस्त थे॥ 

तबहि  विचार हंस चरन  तिरि मन मानस माहि । 
कल्प कारू रचे चरित्र , हेरए काहू नाहि ॥ 
तभी  उसके के मन-मानस में विचार का एक कल हंस तैरने लगा । वह विचार यह था कि कल्पकार रूपी चित्त ने जिस चरित्र को गढ़ा है क्यों न उसे ढूंडा जाए ॥ 

बृहस्पति वार, २६ जून, २०१४                                                                                          

को लिखेरी न को कबि होई । करए  बधूटी चित कह सोई ॥ 
तिन्ह तैं जेहि  साँच असंका । अनबोधित अति जड़ मति रंका ॥ 
वधु न तो कोई लेखनहार थी न कोई कवि ही थी । उसका चित्त जो कहता वह वही करती । उसके सम्बन्ध में यह असंकित सत्य है  कि वह एक अज्ञानी अत्यधिक जड़ एवं बुद्धि से निर्धन थी ॥ 

करत कथा चित अति इतराया । रूचि रंजन उद्भाव रचाया ॥ 
नारी जात सुभावहि होऊ । गहि सो कह बिन रहे न कोऊ ॥ 
उसकेचित्त ने  अति गर्वाचारी  होकर जिस  कथा की रचना की । यथार्तस उसे कल्पना ने  रूचि एवं मन रंजन हेतु रचा था ॥  नारी जाति का यह स्वभाव ही है की  वह अंतर जगत को प्रकट किए बिन नहीं रहती ॥   

मलिन मनस अवगुन बहुतेरे । रसालिक लेख रस गुन पेरे ॥ 
बिनु अनुमति के दूजइ  ठावा । प्रबसि बलइ जस चरन धरावा ॥  
 यह मलिन मानस अवगुणों से  पूर्णित है यह ईख के स्वरूप है जो  रूपी रसों को  कर केवल उनका ही उल्लेख करता है ॥ किसी निजी स्थल में अनुमति रहित प्रवेश बलपूर्वक व्यतिक्रमण के जैसे हैं ॥ 

समालोकन करी जो चाही । बिधि गत समुचित अहहि कि नाही ॥ 
तेहि अवसर नहीं सो जानहि । देई खाचित छमिअ सयानहि ॥ 
किसी संगोष्ठी स्थल पर किसी निजी स्थान में निरिक्षण के उद्देश्य से स्वामी के अनुमति रहित प्रवेश विधि  के उपबंधों के अधीन उचित है अथवा नहीं ॥ तत्समय वधु को यह ज्ञात नहीं था इस भूलचूक  को विदुष गण  अवश्य ही क्षमा कर देंगे ॥ 

मूढ़ मूरख निपट पोच, बृद्धि हीन बधु मान । 

हेर दुर्हेतु दूर रह, कौतुकी एही जान ॥  
वधु को मुर्ख और निपट अधम बुद्धि की  दरिद्र समझते हुवे उसे किसी दुर्हेतु से रहित कृत्य के रूप में संज्ञापित कर  केवल कौतुक स्वरूप में देखना चाहिए ॥ ( अन्यथा किसी की संचित सामग्री की चोरी अवश्य ही एक अपराध है ।  )

शुक्रवार, २७ जून, २०१४                                                                                                   

खचे खांच चिता अंग अनेका। कहि नहि जाए कि कौन प्रबेका ॥ 
बिचित्र चरित्र सब रूप बिचेता । कूढ़ कूट कृत  केत न केता ॥ 

निरख परख अरु कछुक उरेहा । चित्रित चरित्र को किए न सनेहा ॥ 

चहहि ऐसोइ सुमुख सुसाचा । आपनि हरिदै आपहि बाँचे ॥ 

गिरि कंदर बन कानन हेरे । कबहुँ कोउ कबहूँ को डेरे ॥ 
एक नयनी को नयन बिहीना । एक करनी को कानन हीना ॥ 

पथ पर कंकर थर थर बिचरहि । मित पूरब जस हेरत फीरहि ॥ 
नाक कान हैं को बिकरारी । चिन्ह न कीन्ह पुरुख कि नारी ॥ 

बर अभरन धरे रूप रुचिरा । संजोइन सब रूप बहिरा ॥ 
दुष्ट हरिदै दुर्लखन लहिनी  । लागसि जस ब्यसन के बहिनी ॥ 

को जस कीर्ति को धन लाही । सबके अंतर लिखि मुख माही ॥ 

हेर हेर सब डेरे फिरि, भए बहु दिन गह काल । 
सोचे चित लागसि जगत, भयऊ रूप अकाल ॥  

शनिवार, २८ जून, २०१४                                                                                                  

एक दिवस जब देस दुआरी । जगाजोत जग लग उजयारी ॥ 
अरुनाई अचरा कर झूरे । बैभावरि मुख चंदु  प्रफूरे ।  

बरखा बिगत सरद धरि चरना । पथ पथ बिटप साख धरि परना ॥ 
बाली कनक साली कनि धरे । मानहु महि तन अभरन पहिरे ॥ 

दरसत कहुँ तरु साख बिताना । बैस छाईं पाठक थकि नाना ॥ 
संग परस्पर करत बत कही । पढ़त पुहुप पत मधुप गुंजही ॥ 

इत बधु प्रिय परिगह सुधि  हेरहि । नाउ धरे मुख हेरा दे रहि ॥ 
तबहि एक नारि दिए देखाई । परिगह सरिबर नाउ धराही ॥ 

उपमापमेय अलंकृत मुख करि सील श्लोक । 
रही बधु चितबन चितबत तेहि नारि अबलोक ॥  

रविवार, २९ जून, २०१४                                                                                                  

धवलिमन बदन बिगलित केसा । धवलिमन घन स्यामल भेसा ॥ 
अरुन रोचन अधर नुरागे । पलकोपबन नयन पुर लागे ॥ 

कुटिलक भृकुटि जस धनब धनुखा । तोरन तरसत तरन प्रत्युषा ॥ 
दुइ पदम अधर सुधा सरोबर । रोचन रदन मुकुताबली बर ॥ 

बरन पत्री बोलै बिनु बोले ।  कुमुद कुसुम कस कमन कपोले ॥ 
बसहि तेहि पुर सपन अनेका । मनस गगन भर भूषन भेका ॥ 

रूप तेज मुख आन निबासा । प्रतिमान जस करै अभिलाषा ॥ 
चित उलखित प्रतिमित प्रतिलेखे । लेखि का जेहि नयन न देखे ॥ 

पटतर बधिकार निकर सुहासा । लह सब लछन चरित्र जस भासा ॥ 
देखि रूप सुधी बिसारी । बेर लग  रही रूप निहारी ॥ 

बरन बरन बर बरन क्रम, रूप बरन बहिराए । 
सो बरनन बरने न जो, अंतर माहि समाए ॥ 

संचकित संचाइन मैं, सनचत कृत संचाइ । 
बहुरि  संचरत बैमान, संचर चरन फिराइ ॥ 

सोमवार, ३० जून २०१४ 
जोग कारन बिनु रीतहि रीते । पंच दस दिवस गए अरु बीते ॥ 
संगोठी के खेतक ताईं । अब लग भल बिधि लेख न पाईं ॥ 

एक दिन टोही जान तँह आए । नव संगी जहँ देइ देखाए ॥ 
सत संगति संगीति सुहाई । जात  पथिक जिमि लेत बुलाई ॥ 

सत संकलप सार दुइ पाँती । कहत कहबत कथिक बहु भाँती ॥ 
साधौ दरसन जान समुदाई । देखत बनिअ बरनि न जाई ॥ 

लेख परस्पर करत प्रसंसा । जिमि मानस बोलत कलहंसा ।। 
बचन छाजन बरन के छावा । दरस दिरिस  बधु हिय हर्षावा ॥ 

निरखत जोगत सुथर थरि कबिमय  तरुबट छाँउ । 
बधु तहँ तत्पर दंड दिए, रचि एक सुठि ठहराउ ॥ 











 


  

Sunday, June 1, 2014

----- ॥ सोपान पथ १५॥ -----

छहहि मास भए बसत निबासा । चारत सुत भए कुल दुइ मासा ॥ 
तनिक दिवस लग चले सुपासा । पाछिन मुख पर छाइ हतासा ॥  
पराई नगरी में नवासित होकर बसते हुवे कुल छ: माह हो गए ।  विमोचित चरण पट्टिका के सह पुत्र को चलते दो मास हो गए थे । कुछ दिनों तक तो वह बहुंत ही सुख पूर्वक चला । बाद में उसके मुख पर विचित्र प्रकार की हताशा छाई रहती ॥ 
  
गिरे भूमि पर रोदत टसके । चरन न अजहूँ वाके बस के ॥ 
बिचरत होवै पीर घनेरी ॥ दम्पति मन नउ चिंतन घेरी ॥ 
जब कभी वह भूमि पर गिर जाता तो टसकते हुवे क्रंदन करता ॥  चलना उसके वश  में नहीं रहा कारण की विचरण से गहन पीड़ा होती । अब दम्पति के मनो-मस्तिष्क एक नई चिंता से घिर गया ॥ 

बहुरि एकु  जोग जीवद दिखाए । तेहि निरखत उपचर्जा बताए ॥ 
चारि दिवस ता पीरा छाँड़े । तनिक काल मह अस्थिहि गाढ़े ॥ 
उन्होंने   उसे एक योग्य अस्थि के विशेषज्ञ चिकित्सक को दिखाया । उसने पुत्र का भली प्रकार से निरक्षण कर कुछ उपचार निर्दिष्ट किया । चार दिवस लगे  तन से पीड़ा मिट गई, कुछ समय पश्चात उसकी अस्थियां दृढ़ हो गई ॥  

 धीरहि पद संचारन लागे । सुत के सोए भाग जस जागे ॥ 
मात पिता लिए सुख उछबासा । आने तनिक  साँस महु साँसा ॥ 
धीरे धीरे उसके चरण संचालित हो गए जैसे उसके सोए हुवे भाग्य जागृत हो गए हों ॥ माता- पिता ने  एक सुख की उच्छवास ली उनके थोड़ा ही सही किन्तु जी में जी आया ॥ 

कटे पुत के एकु संकट बिरते सुखमय राति । 
जोगित अस्थि संग परे, उर अंतर महु साँति ॥ 
इस प्रकार पुत्र का एक संकट तो कटा  उसकी रात्रि सुख पूर्वक व्यतीत होने लगी । संयोजित अस्थि के सह उसके अशांत हृदय में शांति छा गई ॥ 

सोमवार, ०२ जून २०१४                                                                                                       

अपस्मार जब चिक्कर घारी । पीर जनत  उर तड़पत भारी ॥ 
सतत रूप जब गहनै घेरे । निदान गृह महु जाइ निबेरे ॥ 
अपस्मार का जब चक्कर घेरता ।   पीड़ा जन्य तड़प  से ह्रदय भारी होती ॥  और चक्कर  सतत स्वरूप में सघन स्वरूप में घेर लेते । तब वह निदान गृह में ही विमुक्त होते  ॥ 

जग एक पथ जीवन एक गारी । कबहु हरिएँ कभु  द्रुत संचारी ॥ 
पथिक अनेक मिलहि मग जाता ।  घरी पलक प्रति छिनु दिनु राता ॥ 
यह भव सागर एक पथ है जीवन एक  यान  है । यह कभी तीव्र गति से कभी गतिअवरोधक के कारण मंद गति से संचारित  होता है ॥ मार्ग में जाते हुवे पल प्रतिपल  दिन हो कि चाहे रात में अनेक पथिक से मेल होता है । 

को मन उजरे देहि स्यामहि । को रावन रूपी को रामहि ॥ 
को वितथवदन को सत वादी । को सुखचर को अवसादी ॥ 
कोई मन से उज्जवल एवं तन से स्यामल  है । को रावण रूप में है कोई राम का ही स्वरूप है ॥ को मिथ्यावादी तो कोई कोई सत्यवादी है ॥ कोई सुखपूर्वक गतिवान है  तो कोई अवसाद ग्रहण किए है ॥ 

को धनी मनि  को बहु दीना । को असुरि माया के अधीना  ॥ 
को अति कोमल सुमधुर भासी । को सौ हरिदए सुख की रासी ॥ 
कोई धनवंत है कोई बहुंत दीन है कोई आसुरी माया के आधीन है ॥ कोई अत्यधिक कोमल प्रयंवद /वदा  है । कोई सौहृदय है जो सुख की राशि स्वरूप है ॥ 

कहूँ नख नेमा दरसे सपेमा कहूँ उर दिनकर तरे । 
कहूँ भय भरि राति कहूँ कल गाति प्रत्युष के हस्त बरे ॥ 
कभु दिवस रुआंसे पिय प्रत्यासे लवण लोचन जल झरे । 
कहूं जन गवाईं, बहोरि जाई घर सुघर भुइ हरि करे ॥ 
 कहीं सनेह दर्शता चन्द्रमा कहीं ह्रदय में उतरता हुवा तपन कहीं भयधन रात्रि कहीं  प्रत्युष का पाणि-ग्रहण किए निह्नादित निशा ॥कहीं दिवस रुदनशील  और प्रियतम  की आस किए  लावण्यमयी लोचन से झरता  अश्रुजल ॥ कहीं जन्म दे कर संतति खोई पुनश्च जन्माया और गृह भूमि को सुन्दर एवं भरापूरा किया ॥ 

देह धूपित चरन ताप, कहुँ तरुबर के छानि । 
जब मन पूर्ण काम रहे, लगे सुपासी धानि ॥ 
धूपित देह है चरण संतप्त है कही तरुवर की छाँव है । जब मन पूर्ण कामी होता है वसिधानी अत्यधिक सुखदायी प्रतीत होती है ॥  

मंगलवार, ०३ जून, २० १ ४                                                                                                   

जेइ कहाउत अगजग जाने । कर्म सोंह सब भाग बँधाने ॥ 
भागाधीन भाग पथ जोई । तिन कर्महिन कहत सब कोई ॥ 
यह  कहावत  संसार भर के संज्ञान में है कि कर्म के सह भाग्य का अभ्युदय होता है ॥ जो भाग्य के अधीन हैं और  भाग्य की प्रतीक्षा रत हैं संसार उन्हें अकर्मण्य कहता है ॥ 

बसे बसित  पिय नगर पराई । गह करतल दुनहु सेउकाई ॥ 

एक पद थापिन जहाँ निबासे । दूज निबास नगर के पासे ॥ 
इस प्रकार दोनों वृत्ति करतल में ग्रहण किए दम्पति पराई नगरी के पराए वसथ के वासी  हो गए । एक पद की स्थापना वासित नगरी में ही हो गई । दूसरे की पार्श्व देश के गाँव में ॥ 

कारभवन दुहु गवन निरंतर । दिए  प्रतिदिन मुख कृत हस्ता खर ॥ 
रहहि तहहि के कहनी सोई । करन जोग को कार न होई ॥ 
प्रियतम दोनों ही कार्यालय में निअंतर उपस्थित होते एवं केवल हस्त अक्षर अंकित कर लौट आते । यहां की भी वही कहानी थी करने योग्य कोई कार्य ही नहीं दिया गया ॥ 

कृत क्वचित कर्मिन अधिकाई । पाए दिए जोइ मुँहू भराई ॥ 
कर्मकर जाचक लिख चीन्हे । ठीकाहर अजाचक कीन्हे ॥ 
कदाचित कार्य किंचित थे एवं कर्मी अधिक हो गए थे । अत: 'जो देता वही पाता ' । दुसरा कारण यह कि कर्मकार भिक्षुक के जैसे चिन्हांकित किए गए । ठेकेदार को संपद वान कर दिया गया था ॥ 

दुरमाया बस मतिमंद, भए सब मिथ्यावादि । 
भोग बिषय जय कार किए, करत बिरथा प्रमादि ॥ 
ऐसी दुर्व्यवस्था हो गई है कि  आसुरी माया के वश होकर सभी मंद बुद्धि एवं मिथ्यावादी हो गए  हैं । और भोग विषयों की जय जय कार करते हुवे व्यर्थ का अभिमान करने लगे हैं चार कुकृत्य करके स्वयं को दनुपति समझने लगे हैं ॥ 

 बुधवार, ०४ जून, २ ० १ ४                                                                                                        

सीस छादन बसन अनुप्रासन । जनिमन जनमद जीउ जमोगन ॥  
जुगता बर्धन ज्ञान अधाने । योजन को कर्मन बर थाने ॥ 
शीर्षाच्छादन आवरण अनुप्राशन  आदि जीवन भूत साधन, जन्मदाता के जीवन संरक्षण, योग्यता वर्द्धन , ज्ञान ग्रहण, अन्य किसी श्रेष्ठ स्थान पर कार्य नियोजन

पठत पदोनत जिबिका जोई । पिया के अवर हेतु न होई ॥ 
ए कर पढ़े बिनु होत गभीरे । बिषय सिंधु सो तीरहि तीरें ॥ 
पदोन्नति कर जीविकार्जनादि हेतु के अतिरिक्त  प्रियतम की अध्ययनशीलता का और कोई हेतु न था ॥ यही कारण था कि वह अध्ययन के प्रति गंभीर नहीं थे । उनका विषय सिंधु के सदृश्य और वे तट ही  के तैराक थे ॥ 

गहे घर गहस चारिन भारा । बाही हरुबर बोह अपारा ॥
गवन पीठ पर बहुत उछाही । उपाधि पर एक उपाधि चाही ॥ 
गृह संचालन का भार भी  तो उन्होंने ही ग्रहण किया हुवा था  भार वाही तो दो तोले का और भार एक सेर का ॥  वह भारवाही  विद्या भवन अतिशय उत्साह से जाता, पता नहीं क्यों जाते कदाचित मा सा बनने के लिए ॥ हाँ एक उपाधि पर एक और उपाधि की चाह थी इसीलिए ॥ 

परीछा के समउ जब अवने   । पढ़े बिषय  प्रीतम बहु गहने ॥ 
एकु पुनि दुइ छह  माही दाई । दोनहु मैं पिय कृतफल  पाईं ॥ 
 परीक्षा का समय जब आता  तभी विषयों का गहन अध्ययन किया जाता  ॥ पहले एक तत्पश्चात उन्होंने दूसरी छ मासिक परीक्षा दी । दोनों में ही वह सफल हुवे ॥ 

सनातकोतरु ब्रत गहन, अस बासित पर धाम । 
दुइ कार भवन कर्म जुग, तापर रहि निहकाम ॥  
इस प्रकार  स्नातकोत्तर शिक्षा  ग्रहण करने हेतु  दम्पति पराए धाम के निवासी हो गए । और दो कार्यालयों का कार्य हस्तगत होते हुवे भी अकर्मण्य् ही रहे ॥ 

बृहस्पतिवार, ०५ जून,२०१४                                                                                                 

समउ आपुने पाँख बिताने । उरिन कवन  नभ होहि न भाने ॥ 
बधु जब तब पिय सों हँसि कारें । प्राण तेहि प्रिय नाथ हमारै ॥ 
यह समय अपने पंख विस्तारित किए किस गगन में उड़ा इसका  भान ही नहीं  हुवा ॥   प्रियतम से परिहास कर कहती हे हमारे नाथ प्राणों से प्रिय हैं ॥ 

अधुनातिन्हि राउ के नाई । जोगए सिद्धिहि बैठ बिठाई ॥ 
बधु त कहिब पूरित अनुरागे । पिया उरसिज तीर सम लागे ॥ 
अब तो वह आाजकल के राजाओं जैसे हो गए हैं बस भूति झोके और घर में बैठ गए ॥ वधु ने तो यह अनुराग से पूरित हो कर कहा किन्तु प्रियतम के हृदय में वह शब्द दो तीर के सदृश्य लगे एक ने पार हो गया एक ने प्यार किया ॥ 

कहत  सुहासित रे मम भामा । जनित सिद्धि लहि का बिनु कामा ॥ 
बात बनाउन बहुस कुसलाइ । अवरहि लहत हमरे अभिप्राइ ॥ 
वह सुहासित मुख से बोले हे री मेरी प्यारी भामा । ये लइकिंनिहि के भूति क्या बिना काम के प्राप्य हुई हैं ॥ बात बनाने में तो बहुत कुशल हैं । हमारे अभिप्राय  को अन्यथा ही लेते हैं ( वधु ने उत्तर दिया ) ॥ 

बलित पानि  प्रिय कण्ठन हेरी । तमकि थपकि  दय धुकित निबेरी ॥ 
कर अंतर पुनि पिय लिए घेरी । नयन जुड़ावत बोले हे री ॥ 
और प्रियतम के कंठ से प्रिया ने दोनों हाथों को  लगभग ढूंढते हुव छद्म आवेशपूर्वक थपकी देते हुवे और धकियाती हुई बाहु को  बंधन से विमुक्त की ।  प्रियतम ने पुनश्च अँकवार मुद्रा धारण कर सौम्य लोचन होते हुवे कहा  हे री ॥ 

श्रीमन पतिनी हे गह भ्राजा । सेबक प्रतिमुख  दौ कछु काजा ॥ 
लगन धरावत पिया सुहासै । छेड़ लगा कर मह कर  कासै ॥ 
हे गृह देव की देवी घर की शोभा स्वरूप ,सेवक तुम्हारे सम्मुख है कुछ काम दो ना ॥ । इस प्रकार प्रिया के प्रति परम आसक्त होते हुवे  प्रियतम ने जब परिहास किया और  करतल में करतल कसते हुवे नोंक-झोंक हों लगी ॥ 

कहत बधु ए महनिआ मुख, लगे न मतिवति कोइ । 
दोइ ज्ञान के बात कहत, सब कहि बिरथा होइ ॥ 
तब वधु ने कहा इस महनीय के मुह कौन मतिवती लगे । दो ज्ञान की बातें कहो सो सब व्यर्थ है ॥ 

शुक्रवार, ०६ जून, २०१४                                                                                                                

 कासि करक जब करष कलाईं । कसमसत फूरि गालु फुलाई ॥ 
बोली सुमधुर निलज कहीं के । जो कछु अहै सो आप ही के ॥ 
ऐसा कहते ही प्रियतम ने  जब कोमल कलाइयों को अपनी मुष्टिका में कसी तब वधु झूठ मुठ के गाल फुलाते हुवे कुलबुलाने लगी ॥ और सुमधुर स्वर में कहने लगी निर्ल्लज.....कहीं के......तब प्रियतम ने उत्तर दिया जो भी हैं सो आपके ही हैं ॥ 

अस सुनि  बधु अस दीठी मोड़ी । ह्रदय भवन पिय पीठी जोड़ी ॥ 
बाहु सिखर धरि हनु जब रागे । रूप लुभावन  अति प्रिय लागे ॥ 
ऐसा सुन कर वधु ने अपनी दृष्टि फेर ली  तो  प्रियतम ने पृष्ठक को  अपने ह्रदय भवन से संलग्न कर लिया ॥ और वधु के बाहु शिखर पर अपनी हनु रखकर अनुराग से परिपूरित हो उठे । प्रियतम  का ऐसा लुभावना रूप वधु के अतिशय मन भावन लगा  ॥ 

जो को कारज कर ना दाही । सोइ  दास कहू त  कहँ जाही ॥ 
पढ़े पोथि जो पलक न पंथा । रागन बिनु नर होहि न संता ॥ 
यदि कोई कार्य हस्तगत नहीं करेगा । कहो तो वह दास फिर  कहाँ जाएगा , क्या करेगा ॥ और यदि वह पलक पंथ की पोथी भी नहीं पढ़ेगा । तो विरक्त होकर वह नर साधू न बन जाएगा ? ऐसा प्रियतम का कहना था ॥ 

प्रीति काज जो करतल गाही । जस तुम लेखि सरल तस नाही ॥ 
सो बय केहि बिधि बात सँवारे । प्रिया बचन पर मन मह घारे ॥ 
प्रीति का कार्य ? उसका क्या ? जो करतल ने पहले से ही ग्रहण किया हुवा है ?  जैसा तुमने इसे सरल समझा है यह उतना सरल नहीं है ॥ उस समय तो प्रियतम ने  किसी प्रकार बात संवार ली । किन्तु प्रिया के वचन उनके चित्त में कहीं गहरे अवस्थित हो गए ॥ 

बहुरि कर्मन हेर लगे, चिंत ब्याकुल होइ  । 
निसदिन ज्ञापित पत्र  लखे, कभु कोइ कबहु कोइ ॥ 
तत्पश्चात प्रियतम उद्धिग्न स्वरूप में कार्य ढूंढने लगे  । वह नित्य प्रति दिवस विभिन्न प्रकार के ज्ञापन पत्र का पर दृष्टि रखते ॥ 

शनिवार, ०७ जून, २ ० १ ४                                                                                                       

एकु निजि बिद्या गह दिए ज्ञापन । चहहि कछुक जन हुँत अध्यापन ॥ 
पढ़त करे याचन अरु जोगे । अस पुनि पाठन करम निजोगे ॥ 
एक निजी विद्या निकेतन ने ज्ञापन दिया । अध्यापन कार्य हेतु कुछ अधयापकों की आवश्यकता है ॥ उसे पढ़कर उस पद हेतु अभ्यर्थना की इस प्रकार वह पुनश्च अध्यापन कार्य इन नियोजित हो गए ॥ 

दुइ पुरनई चयने एकु भृते । वाके श्रम भूति हस्त न कृते ॥ 
सोइ पदक पूरन परिहारे । पिया मुख धुनी  कहि अनुसारे ॥ 
दोनों पुरानी वृत्ति में से एक वृति का चयन किया । उस चयनित वृत्ति का प्राश्रयक फिर उन्होंने फिर हस्तगत नहीं किया । प्रियतम के कहे हुवे शब्दों के अनुसार उस पद को उन्होंने पूर्णत: त्याग दिया ॥ 

जेतक परिहरु पद भृति लहहीँ । नवल नियोजन  तेतहि गहही ।। 
कहुँ  पुतिका कहुँ पिता पढ़ाई । कहुँ जनित्र भवन लागन दाईं ॥ 
जितनी हस्त सिद्ध त्यागित पद से प्राप्त होती थी । नए नियोजन में भी लगभग उतनी ही सिद्धि धार्य होती थी ॥ कहीं  पुत्रिका की पढ़ाई कहीं उसके पिता की पढ़ाई । कहीं जन्मस्थान में क्रय किये हुवे भवन के ऋण शोधन अंश का व्यय । 

पेट लपेट गह भाटक हुँते । नहि नहि कृत रहि ब्ययहु बहुँते ॥ 
जनमन सन पूरन परिबारा । धन सोंह तोष तहँ दुःख हारा ॥ 
 पेट के लपेट के लिए कहीं गृह-भाटक के लिए, नहीं नहीं करते भी धन अधिक व्यय हो  रहा था ॥ संतान धन के संग जहां परिवार पूर्ण हो ऐहिक सुखों के साधन भूत द्रव्यों के प्रति संतोष के भाव हों वहाँ दुःख  पराजित हो जाता है ॥ 

तथापि कबहु बधु के मति, पथ यह अभिमत आए । 
को सत्कृत को हेतु बिनु, जिउन बिरथा सिराए ॥  
तथापि वधु का मनो-मस्तिष्क की सरणी में इस मत विचरण करता कि किसी सत्कृत एवं हेतु से रहित, उत्तम देह साधन के सह यह जीवन व्यर्थ में समाप्त हो रहा है ॥ 

रविवार, ०८ जून, २०१४                                                                                                              

प्रियतम लेखि मृषा सम पुंजी  । रसना कोष अधर  कर कुंजी ॥ 
प्रिया कहति बनु लाह निकाई । बरतौ तिन  करत कृपनाई ॥ 
प्राण कान्त के लिए मृषा  पूंजी के सरिस थी । अधर को कुंजी किए जिह्वा ही उस पूंजी की कोष थी ॥ प्राण प्रिया  कहती यह बिना लाभ का आगार है । इसे कृपणता पूर्वक व्यय करना चाहिए ॥ 

अधुनातन जे भू संसारा । जेतक  अवगहु तेत अपारा ॥ 
पहिले जग जन सिरु धरि ज्ञाने । सद कृत गुन गन किए सनमाने ॥ 
अद्यावधि में इस भूलोक में जितना बुढो यह उतनी ही अपार है अर्थात ससे पार नहीं पाया जा सकता । पूर्वकाल के सांसारिक लोग ज्ञान को सिरोधार्य कर सदकृत एवं सद्गुणों के समूह का सम्मान करते थे ॥ 

अजहुँ कुचालि चलन मह आहिहि  । सत दुत्कारत झूठ सराहहिं ॥ 
जहां जुगत जुगता कूप झाँखे  । फलाराम भाखन फल लाखे ॥ 
तुम किस धरती पर हो, इस समय तो दुराचरण का चलन है । यहां सत्य दुत्कारा जाता है असत्य प्रशंसित होता है । यहां  सद्युक्तियां  एवं योग्यता द्वार द्वार भटकती हैं । फलों का उत्पादक किसान फल को ही  तरसता है ॥ ॥ 

कपट बेस बयसनी कुपंथा । कुबिचारी लेखे  मह ग्रन्था ॥ 
दुरा चरन के बहि जहँ नाला । चीन्ह नहि तहँ कौन ब्याला ॥ 
कपट वेशी (अर्थात जिनकी कथनी में राम और करनी में छुरी है ),व्यसनी, दूषित विचारी दुष्ट यहां नियम-निबंधित करते हैं, रावण मर्यादा निर्धारित करता है ॥ जहां दुराचरण का परनाला बहता हो । वहां  शठ दुष्ट एवं हिंसक जंतुओं में भेद करना कठिन है ॥ 

 मतिबत  सठ सठ कह कह मतिबंता । तहँ सबहि नाउ सौधौ संता ॥ 
जीव जग सबहि जन अपराधी । जोइ गहे गए सो भए आधी ॥ 

जहां मतिवन्त  डकैत एवं डकैत मतिवन्त कहलाते हों वहां सभी साधू-संत कहलाते हैं अत: तुम किसी को दुराचारी मत कहो ॥ इस जीव-जगत में सभी अपराधी हैं काल सभी को दंडित करता है । जो जीते जी पकड़ा गया वह बंधक है ॥ 

जाके कोष अधिकाधिक, गाहे मृषा के जोग । 
ते हुँत सबहि  बिषय सुलभ, सब साधन संजोग ॥    
जिसके जिह्वा कोष ने जितना  अधिक असत्य -धन संजोया हुवा  है । उस हेतु सुख के सभी साधनों का संयोग होते हुवे भोग के सभी विषय सुलभ हैं ॥ 

सोमवार, ०९ जून, २०१४                                                                                                 

छुधा तीस छादन ओहारे । इहिं लग ग्यान सीउँ तुहारे ।। 
कस काम लहे कस धन जोगेँ । कस छत छादन असन सँजोगें ॥ 
क्षुधा, तृष्णा, छादनाच्छादन तुम्हारे ज्ञान की परिधि यहीं तक है । कार्य किस प्रकार प्राप्त  किया जाता है जीवन धन किस प्रकार अर्जित किया जाता है भोेजनाच्छादन किस प्रकार एकत्र किया जाता है ॥  

दुअरि बहिर् कहुँ चरन  न दानै । सो तिय जग प्रपंच का जानै ॥ 
सदा चरन चर जो सत भाखे । होत भेखारि कन कन लाखे ॥ 
जिसके चरण द्वार स बाहिर कहीं पड़े नहीं वह स्त्री जग किए प्रपंच को क्या जाने ॥ संचरण का व्रत करकके जो सत्यभाषी होता है वह भिक्षुक होकर कण कण को जोगता है ॥ 

मानहि जग धन वंत  कुलीना । भोग बादि हिन  कह जग दीना ॥ 
सो घर सोई सुघर समाजे । जहँ सुख के सब साधन  भ्राजे ॥ 
यह जीव-जगत  धनवंत को ही कुलीन कहता है ॥ भोग वादिता का तिरस्कार   करने वाले यहाँ अकिंचन कहलाते हैं ॥ वह घर वह समाज ही सुरूप है जहाँ आमोद के सभी साधन सुशोभित हों ॥ 

भोग बिषय जिन भवन बिलासे । तहँ आदर सन्मान निबासे ॥ 
जे धन सम्पद कहँ सो आही । केहि सोंह जे को बूझत नाहीं ॥ 
उपभोग के सभी विषय जिन भवनों मन क्रीड़ा करते हों वहां आदर एवं सन्मान निवास करता है ॥ श्रम तो सभी करते हैं ये सिद्धियां प्राप्त करने हेतु  धन कहाँ से आया (पेड़ से पेड़ से ) कहीं गोले फोड़े ? या देश बेच दिया ? अथवा उसकी धरती बेच दी या पूरी रेल जला के आया ।यह किसी से पूछा नहीं जाता । 

पाखन वाद बिनसि सत पंथा । तिन्हते लुपुत होहि सद ग्रंथा ॥ 
सत भाखिनि जे सत्कृत प्रबचन । कान करज दिए कह तिन भाषन ॥ 
इन पाखंडी विचारों के प्रसार ने सत्य के पंथ का नाश कर दियाहै इसने ही सद्ग्रन्थ विलुप्त कर दिए हैं अत: पथ रहित पथिक कैसा ॥  सत्य विभाषण और यह सत्कृत का प्रवचनों को लोग कान में उंगली देकर कोरा भाषण कहते हैं ॥ 

जे अधुनातम जुग  इहाँ , बिनै जोग अपमान । 
ब्याल काल कलुष संग, पूजत इहँ अभिमान ।। 
यह अधुनातन युग है यहां विनयी अपमान का अधकारी होता है । दुष्ट, हिंसक, धृष्ट, पापाचारी के संग यहां अहंकार की पूजा होती है ॥ 

मंगलवार, १० जून, २०१४                                                                                         

ते समउ पिय रूप लखि कैसे । बिकल हीन मनि फनिधर जैसे ।। 
बहियर हाँ में हाँ मेलाई । अबर रहेहि न कोउ उपाई ॥ 
उस समय प्रियतम कैसे दर्श रहे थे । जस मणि के वियोग में सर्प विचलित होता है ॥ वधु हाँ में हाँ ही मिलाती गई और कोई चारा भी नहीं था ॥ 

कारन कि अस जुगता  न जोगी । कोउ कार कृत बन सहजोगी ॥ 
घर दसा न रहि ऐसिउ तापर ।  रुगनित पुत हस्त धरे आँचर ॥ 
कारण कि उसकी ऐसे योग्यता नहीं जुटाई थी जिसके सह वह कुछ कार्य कर श्रमधन से गृह संचालन में प्रियतम  सहयोगी बने ॥ इर उसपर घर की ऐसी नहीं थी पुत्र अपस्मार रोग से ग्रस्त था उसे प्रतिक्षण ममता की  आवश्यकता थी ॥ 

अहइ दोष आपुनि मन माही । नित निस दिवस बिषय नउ चाही ॥ 
बासन अभरन रसवर भोजन । सुठि सुठि छादन सुठि सुठि साधन ॥ 
दूजे अपने ही चित्त में जब दोष है उसे णतीय प्रतिदिन नए नए विषयों की अभिलाषा रहती है ॥ वस्त्रोभूषण के संग रवार भोजन सुन्दर सुन्दर गृह छाया और बाहर बढ़िया -बढ़िया -साधन-वाहन-कानन- चाहिए ॥ 

धनिमन स्वजन धनी समाजे । भोग बिषय जहँ घर घर साजे ॥ 
तिनके सोंह दुर अनख जगाएँ । पूरनित लाहन लाग लगाएँ ॥ 
जब स्वजन धनवंत हों और समाज भी धनी हो झा भोग विषय घर घर में शोभा प्राप्त कर रहे हों ॥ तब उनके संग एक  दुर्स्पर्धा होने लगती है । तब अभिलाषाओं को पूर्ण करने हेतु घर घर में जुझाऊ बाजे बजने लगते हैं ॥ 

अतिसय जीवन धन संग, भोग बिषय की चाह । 
मृषा भाष बिनु कपट के, पूरन होहिहि नाह ॥ 
जीवन की आधार भूत आवश्यकताओं को अधिकाधिक करते हुवे फिर भोग विषयों की चाह । यह सब मृषा वाद एवं छल-कपट एवं अपराध किए बिना पूर्ण नहीं हो सकती ॥ 

बुधवार, ११ जून, २०१४                                                                                                          

सबते प्रथमक आपन पेखे  । पुनि पिय संग दुजन उर देखे ॥ 
तापुनि आपुनि आप सुधारौ । तदनन्तर दुज  दोष निकारौ ॥ 
प्रथमतस स्वयं को देखना चाहिए  फिर प्रियतम के सह दूसरों के भीतर झांकना चाहिए ॥ तत्पश्चात स्वयं का   सुधारीकरण करन कर फिर दूसरों के दोष निकलना चाहिए ॥ 

रोचिस रोचन रूप सलौना । चह सिंगारी साज सजौना । 
कहुँ भूषन बर भेस लुभावै  । सौरन सँवरन नारि सुभावै ॥ 
यह प्रकट होती हुई शोभा,प्रिय लगने वाला सलोना रूप,श्रृंगार प्रसाधनों युक्त होकर श्रृंगारित होने की चाह करता है ॥ कहीं उत्तम आभूषण कही बढ़िया बढ़िया वेशभूषा लुभाती हैं । सारांश यह है कि सजना-सँवरना नारी का स्वभाव ही है ॥ 

हस्त रस्मि गाहे रथ नीके ।  लिखे आप जो आपनि लीके ॥ 
चारु चरण सन सनलग बाही । तेहिं रसमइ असनहु त चाही ॥ 
जब हस्त  सुसुन्दर रथ की रश्मियाँ ग्रहण किये हो । जो अपना पंथ अपनी मर्यादा स्वयं लिख रहा हो ॥ जिसके कुमकुम से युक्त चरण हों जिसमें उत्तम अश्व बंधे हों । तब ऐसे रथवाही को रसमयी भोजन भी तो चाहिए ॥ 

छतर चँवर धर तिलकित भाला । चहही बासन सुठि सुख साला ॥ 
नारि संग गहि एहि कठिनाई । बिषय बिरति एहि जाति न भाई ॥ 
और जब वह छत्र एवं चँवर तिलकित भाल जैसे उत्तम चिन्हों से युक्त हो   तो उसे एक उत्तम रथ शाला भी चाहिए, वो खोली में थोड़े खड़े होएगा ॥ नारी  के संग यही समस्या है, यह ऐसी जाति है जिसे विषयों की विरक्ति नहीं भाती ॥ 

का गहे अरु का परित्यागें ।सबहि बिषय मनभावन लागे ॥ 
भेस भरन जग बहुस बढ़ाई । गह परिबारु सदन सुखदाई ॥ 
वह क्या तो स्वीकारे क्या त्यागे । उसे तो सभी विषय मनभावन लगते हैं ॥ मायावयी वेशभूषा से सज्जित कुल का , परिवार का, सुखदाई सदन से युक्त जीवन का जगत में बड़ा सम्मान है ॥ 

जगज जगज जननी सिया चरित्र  जो नर सिरुधारि । 
कहि गए बुध होहिहि सोहि अवसहि प्रत्याहारि ॥ 
फिर क्या करें ?  विद्वान कह गए हैं जो नारी जगजजननी माता सीता के सद्चरित्र को सिरोधार्य करती है । ऐसी नारी  अवश्य ही विषयों के बंधन से विमुक्त रहेगी ॥ 


बृहस्पतिवार, १२ जून, २०१४                                                                                               

बिषय भोग तैं नर नागर के । नेम बंध को निगदै वाके ॥ 
राम चरन चित किए भाव रमाई। जथा जोग बिषअन परिहाई ॥ 
पुरुषों में  विषय भोग की प्रवृत्ती का क्या ? उसके नियम बंधनों की कौन कहे ? ईश्वर के चरणों में चित्त लगाके उसकी भक्ती में नियग्न होकर पुरुषों को विषयों का यथा-योग्य परित्याग करना चाहिए ॥ 

जद्यपि मैं  अनभल अपराधी । भै  मम  कारन सकल उपाधी ॥ 
जे बिपलौ पिय कृतकर जोही  । गेह गृहस  के हुतेहि होही  ॥ 
यद्यपि मैं भलमानस नहीं हूँ अपराधी हूँ । पिछले जितने उपद्रव हुवे हैं वह मेरे ही कारण  हुवे हैं ॥ जो प्रियतम के द्वारा विप्लव हुवा है वह घर-गृहस्थी  संचालन हेतु हुवा है ॥ 

ब्ययई के त बहुत उपाया । ब्यसनी को पार न  पाया ॥ 
जेइ खल मल संकुल समाजा । बिलासिता के जान बिराजा  । 
अति व्ययी के तो बहुंत उपाय हैं किन्तु व्यसनी को सुधाना टेडी खीर है ॥ और अब यह दूषित कार्यों में  प्रवृत्त समुदाय एवं समाज जो विलासिता के विमान में विराज कर : -- 

चरनहार बन बिहगेसा । न जान गत को बिदिस बिदेसा ॥ 
छाए जगत बिपलव चहु ओरा । काल धर्म निज देस न थोरा ॥ 
पैरवाला है किन्तु बिहगेस बना फिरता है । जाने किस दुरदिशा में किस विदेश में विचरता है ॥ अब विधाता जीव-जगत इन यदि कोई नव निरूपण करेंगे तो पंख वाले मनुष्य ही निरूपित करेंगे ॥ । अधुनातन जगत में चारों िशाओं में विप्लव छाया हुवा है । दूषित प्रवृत्ति अपने देश में किंचित नहीं है ॥ 

भव सागर गन अवगुन सोधै । जो अबयब बाहिर जग बोधे ॥ 
भयउ गगन मन मेघ बिचारे । बरखन को भू जोग निहारे ॥   
इस संसार रूपी सागर ने गुण एवं अवगुण दोनों ग्रहण किये हैं । जिन अवयवों से बाह्य-जगत का बोध होता है । वे इसका शोधन करते हैं ॥ इस चिद घन गगन में विचार मेघ बने हुवे हैं और वर्षं हेतु किसी सुदेश की प्रतीक्षा में हैं ॥ 

मानस चरन नदी नग धारे । पलक पाँखि रत  गगन बिहारे ॥ 
ऐसेउ चिंतन ब्ययगाढ़े । ज्ञान कोष सम्पद नित बाढ़े ॥  
मनो-मस्तिष्क के चरण आदि एव पर्वतों पर धरकर पलक के पंक्षी गगन विहारने मन रत रहते ॥  इस प्रकार चिंतन में निमग्न हुई वधु के ज्ञान कोष की संपदा नित्य बढ़ती गई  ॥ 

 जिग्यास अधीना, अस बन मीना ज्ञान सिंधु अवगाहे । 
मनसौकस मन जग सब साधन तापर थाह न लाहै ॥ 
कहुँ सुख आधारा, सुधित सुखारा, मानस जग बिरचे । 
जहाँ धर्माचारी, चिंतन हारी, जीवन प्रपाथ प्रपचे ॥  

आपुनि दुआरि धाम  राज किए कछू काज किए,। 
॥ 
प्रतिछन मननसील रहे 
शुकवार, १३ जून, २०१४                                                                                                       

का असाँच अहहीं का साँचे । को काल मलिन को छल राँचे ॥ 
को खल बादए को कल बाँचे । को कोटि कोटि को पै पाँचे ॥ 

परखनबैया हंस सुभावा । अजहुँ चित गहि नहीं सो भावा ॥ 
रतन  काच  दुहु एकरस कासे । को हरिनय अरु को संकासे ॥ 

जे दृढ मत अंतर दुहु राखे । गाहे गूहन नयन न लाखे ॥ 
काहे के को उतरु न  देई । अस बहुस पूछ  संचेई ॥ 

निज भीतर जब कलेस कलुखा । यह बाहिर जग भयंकर सुखा ॥ 
भोग प्रबन रत बिषय प्रलोभा । चहे भव भाव सकल जग सोभा ॥ 

अस बधु मन मानस बिहग, तिरत गगन चहुँ ओर । 
भँवरत आ फिरैं तहहिं, पावहि ना को छोर ॥  

शनिवार, १४ जून, २०१४                                                                                                          

बसे  नौ नगर नवल निवासा । सुखद जिउ न  के कृत प्रत्यासा ॥ 
काल माल एक गांठी गूँथे । घरी पुहुप पल पंख बरूथे ॥ 

अर्थ दसा रहि सब बिधि दाहिन । गहे गेह अभाव को नाहिन ॥ 
छिमा दया दम सौच सुभावा । हरी पद रति पर तोष अभावा ॥ 

जिनकी मति भव भोगन माही । जीवन धन जोरत जाहीं ॥ 
तिन हुँत दंपति गह अवनाई । अतिथि गहन होहहि कठिनाई ॥ 

जोग अभोग रोग जब देखे । सकुचित भौ  नक लक बल रेखे ॥ 
आगत पूजत पति कहि देबा । अनागत जुहारत कृत सेबा ॥ 

एक सुठि तनुभव एक भवा, एक सुठि प्रानाधार । 
एक लघु गृह कानन रूप, एक लघुबर संसार ॥ 

 रविवार, १५ जून, २०१४                                                                                                     

बाल लसित सस रथ अवरोही । तनु भवा दस बरिस बय जोही ॥ 
पैह पोषन देह भर बाढ़े । लह लावन रूप धन गाढ़े ॥ 

चाप चरण जस बाजि पखावज । बधे नुपूर रुर खनकै सों रज ॥ 
अधर धुनी हर जब कछु बोले । सुर सपतक लिख नदि पद दोले ॥ 

नौ बरिस बरग मैं अधिरोही ।जोग बुद्धि सह संजुग होही  ।। 
रहे मनस अति बाल प्रबोधन । बे संधि हेतु गहत प्रबोधन ॥ 

सत बरसि तनय  बे कृत कारी । बोध गम बुद्धि कुंठ अधारी ॥ 
बाहि भँवरन पाछिन भागे । उदार धरत कन खेलन लागे ॥ 

दोइ भाँति  के रसायन, अरु इत उत के उपचार । 
अपसमार के रुज माहि , होहिहि अलप सुधार ॥