Saturday, March 16, 2013

----- ।। सुक्ति के मनि 4।। -----

शनिवार, १६ मार्च, २०१३                                                                              
भाग नखत बल संपद रेखे। कहँ बर तिस दिन बिरंचि लेखे ॥ 
जाने का जुगतिहि जोग लिखाए । भावी बचन कहु को कह पाए ॥ 
भाग्य के तारे एवं उसकी चमती सौभाग्य शक्ति की रेखाओं को इस दी स्वयं विधाता ही लिखते है 
ऐसा बढ़े वृद्धों का कहना है ॥ न जाए कौन सी योग्यता की युक्ति यह शिशु लिखाए अब भविष्य को 
तो कोई पढ़ नहीं पाया है ॥  

भाग धेय जे भाजक देई । कही बधु निज करम कर लेई ॥ 
भव सागर जे भूषन जोगे । पार तर करहीं तेहिं लोगे  ॥   
दाता जो भी सौभाग्य देता है वह स्वयं कर्म करने से ही प्राप्त होते है ॥ जो मनुष्य जगत के भूषन रूप 
की योग्यता रखते हैं कवल वे ही इस संसार के बंधन को पार कर पाते हैं ॥ 

जनम मरन के नियति नियंता । सेष सकल मत मनु के मंता ॥ 
काचे पाके फर बहु फ़ूरे । कोउ ढुरके को डारि झूरे ॥ 
जन्म-मरण का नियंत्रक तो यह विधाता है । शेष सभी विचार लोगों के विचारे हुवे हैं॥ कच्चे-पक्के रूप 
में फल तो बहुत ही फूलते हैं किन्तु कोई गिर जाता है तो कोई दाल में प्रफुलित रहता है ॥ 

दान धरम सद करम सहारे । मनु भव बंधन पार उतारे ॥ 
सिन्धु तर बहु नदी अरु नाले । एक गौर मधुर एक करू काले ॥ 
दानशील स्वभाव और सदकर्मो के सहारे मनुष्य इस जन्म-मृत्य के चक्र से विमुक्त हो सकता है । सागर 
में नदी और नाले दोनों ही समाते हैं किन्तु एक स्वच्छ और मधुर प्रकृति का और एक कडुवा और मलिन 
होता है ॥ 

भोगी पाप भार भरे भले मन भार परे । 
अमल नीर ऊपर तरे मैल मलि नीच धरे ॥  
जो मनुष्य भोग वादी होते हैं वे पापो के भार से युक्त होते हैं जबकि भलेमानस पापों के भार से विमुक्त होते हैं । 
मलहीन जल ऊपर तरता है और माली जल नीचे रहता है ( उसी प्रकार मनुष्य की भी गति होती है ) ॥ 

रविवार, १७ मार्च, २०१३                                                                                  

सुनत  घर बर अस बचन भनिते। कहि आ भए धिय त्रिगुनी गनिते ॥ 
सुन अस धिय के मुख हँसि छाई । जे न बिकसि ते कलि बिकसाई ॥ 
घर के बड़ों जब ऐसी कथा-वचन सुने तो कहाने लगे कि पुत्री को माया की गणित आ गई ॥ ऐसा सुन कर धिय 
को हँसी आ गई ॥ जो कलियाँ अब तक नहीं स्फुटित नहीं  थी वह भी प्रस्फुटित हो उठी ॥  

बोलि मधुर अब भइ महतारी । आई मोहहि दुनिया दारी ॥ 
सकल दिसा भै बहु सुखदाई । ममतइ बधु पी सुध बिसराई ॥ 
वह मीठे से बोली अब मे माता बन गई हूँ मुझे भी सारे सांसारिक प्रपंच आ गए हैं ॥ ( इस प्रकार ) सारी  दिशाए 
बहुत ही सुखदाई हुई । और बालक की ममता में वधु पीया की स्मृति भी भूलती रही ॥ 

बिरह बदरि पर गगन न छोरे । लगे छटे झट भए घन घोरे ॥ 
काम क्रोध मद लोभ लिपसाए । प्राण पियारे परिमतिहि घिराए ॥ 
किन्तु विरह के बादल गग से विलुप्त ही नहीं होते ।  थोड़े से छटे हव प्रतीत होते किन्तु पुन: घने हो जाते ॥ काम, 
क्रोध, मद और लोभ की लालसा लिए हुवे के घेरे में पिया घिर से गए है ( अत : वधु की सुध ही नहीं ले रहे ) 

मंगल अवसर चारन चारे । तुरहि खंड सुर  भवन दुआरे ॥  
एहि बिधि छठ के उत्सव पूरे । अरु सिसु पितु रहि दूरहिं दूरे ॥ 
शुभ अवसर में रीती पूर्वक आचरण से पीहर का के भवन-द्वार ढोल की थापों से सुरमई हो उठे ॥ इस प्रकार छठी का 
उत्सव उल्लास पूर्वक समाप्त हुवा । और शिशु के पिता दूरियाँ बनाए हुवे थे ॥ 

जथा जोग बसन भूषन दै दिज भामिन दान । 
करत बहु मंगल वादन हरसत किए प्रस्थान ॥ 
यथा योग्य वस्त्र आभूषण को ब्राम्हण की स्त्री को दान दिया । बहुंत से आशीर्वचन कहते हुवे हर्ष पूर्वक ब्राम्ह स्त्री चली
 गई ॥  

सोमवार, १८ मार्च, २०१३                                                                                               

पुत के चित दुइ करमन जाने । निंद नयन अरु उदर दाने ॥  
सिसु के रहि तनि दुबरै काई । कही भवज पी पय भरजाई ॥ 
पुत्र का ह्रदय तो दो ही काम जानता, आखो से सोना और उदर में खाना । 
शिशु की काया थोड़ी दुबली थी , भावज बोली उह पीने से शरीर भर जाएगा ॥ 

 काल कलित क्रम क्रमसह बीते । भर बिरह अह अहर्निस रीते ॥ 
अस्त गमनु अहि कालहु भाला । उयऊ अहुटे भालहु काला ॥
काल अपना क्रम ग्रह कर क्रमश: बितता गया । विरह से भरे दिन-रात भी व्यतीत हों लगे ॥ 
डूबते हुवे सूर्य को अन्धेरा खा जाता और उदित होता सूर्य अँधेरे का काल बन जाता ॥ 

कोटिक छिनु पर भए एक मासे । पीहर घर महँ बधु रहि बासे ॥ 
पुनि एक दिन बहु दुःख कर पोई । कुँवर काय जाने का होई ॥   
करोड़ छन के बाद एक महिना हुवा । और वधु का निवास पीहर में ही रहा  ॥ 
पुन: एक दिवस बहुंत ही दुःख लेकर अंकुरित हुवा । बेटे की काया को जाने क्या हो गया ॥ 

ताप तनुज तन तापन थापे । कोउ जतन जुत दाप न थापे ॥ 
बयस लघुत पर गढ़ ताप बढ़े । घडी घड़ी बढ़ बहुस ही चढ़े ॥ 
तुज के तन ने ज्वर पकड़ लिया । और कोई भी उपाय से वह स्थिर नहीं हो रहा था अर्थात 
बढ़ता ही जा रहा था । हुशु की अवस्था तो छोटी थी किन्तु ज्वर विकराल रूप धारण किये हुवे था 
और क्षण प्रतिक्षण उसका आकार बढ़ कर ऊपर चढ़ता ही जा रहा था ॥ 

मनु तापित देही अँगारि में ही अगनित बसन बसे । 
दरस द्रोन कलस दृग द्रविनोदस अरनित यजमन से ॥ 
माए बहु सनेही चूमकर लेही लालन निलयन लसे । 
हो जहि कछु अस लघु बाल बयस गहबरन गह गसे ॥ 
तपती हुई देह मानो अंगीठी स्वरूप हो और उसे अगि के वस्त्र धारण कर लिए हों वह ऐसे दर्शित हो 
रहा है जैसे वह कोई यज्ञ का पात्र हो और उसकी आंखें अग्नि प्रदान  करने वाले काठ के यंत्र  के समान 
होकर यज्ञ का आयोजन कर रही हों ॥ माता का स्नेह उमड़ पडा उअसन लाल को चूमकर ह्रदय लगा लिया । 
ऐसी लघु अवस्था में कही कुछ हो  जाए यह सोचकर बहुंत ही घबरा जा रही थी ॥ 
  
भोर भए नभ भानु भरे बाल  पलक रह मूँद । 
मंद कान्त मुख ना धरे प्यास के एकहु बूँद ॥   
भोर हुई अभ उरु से आभर्णित हो उठा, कितु बालक पलको को बंद किए हुवे था ।  और मुख मुरझा गया था 
वह माँ के दूध की  एक भी बूंद भी ग्रहन नहीं  कर रहा था ।। 

मंगलवार, १९ मार्च, २०१३                                                                                   

ताप तपन भए कुंदन लाला । तपित पदुम पद कर उर भाला ॥ 
नीर भरी धिय जी भरी लाए । बारहि बार सिसु कंठ लगाए ॥ 
ज्वर के ताप से लाल का सोने जैसा शरीर मानो कुंदन हो चला था । ज्वर कमल जैसे चरण एवं हाथ और छाँती 
से लकर माथे तक को तपा रहा था ॥ नीर भर के पुत्री का जी भर आया और वह बार-बार सिसु को कंठ से लगाने 
लगी ॥ 

एक बार त बिलख बिलापी । रोदन कर बहु थर थर काँपी ॥ 
तब तात भ्रात साद अकुलाहि ।  लै जहु कहि बेदु राज पाहिं ॥ 
एक बार तो वह बहुत ही बिलख कर रोई । और रोने से बहुंत ही कम्पित हो गई । तब पिता और भ्राता क्लांत होकर 
व्याकुलित हो उठे ॥ और शिशु को श्रेष्ठ वैद के पास ले जाने को कहा ॥ 

अरु अरुँनई कर करुन सरिते । गै बेदुहु पहिं लालन लसिते ॥ 
उर कम्पन गति नाभि निरीखे । लालन लोचन तीर परीखे ॥ 
आँखों में लालिमा भर कर माओ करा की नदी ही प्रवाहित हो रही है ।  और बालक को चिपकाए वधु वैद्य के पास गई 
।। वैद्य ने ह्रदय की स्पंदन  गति और नाभि का निरिक्षण किया तथा पुत्र की आँखों को फैला कर उसका परिक्षण किया ॥ 
    
ताप मापित तप अंक  कलिते । गुन गनित  कर औषधि लखिते ॥ 
कहि दौ तेहि समउनुसारे । पान  कराहु सह सुधाधारे ॥ 
ताप मापक लेकर तापांक गिह कर फिर सोच विचार कर औषधि लिखी ॥ और कहा इस औषधि को समय अनुसार देवें । 
और साथ में माता के प्रेमरस का पान कराते रहें ॥ 

बैदु राज के बचन सुन बधु के उर परि थाप । 
औषधि ले के नियम गुन घर आपन लइ धाप ॥    
श्रेष्ठ वैद्य के वचन को सुन कर वधु का हृदय पर ठंडक पड़ी । औषधि लेने की विधि पूछ कर घर पहुच कर संतोष धरा ॥ 

बुधवार, २० मार्च, २०१३                                                                                   

पहर पहरि चढ़ दिन मनि बाढ़े । साँझ ढरी ते रजनी गाढ़े ॥ 
सरर सरित सित सरयु तरंगे । पर ताप तरित न तनु भवंगे ॥ 
पहरों पर चढ़ कर सूर्य आगे बढ़ा । साख के ढले पर रात भी गहरा गई ॥ नदी की शीतलता वर कर वायु सर्प के जैसे तरंग 
धरे सर-सर करके प्रवाहित हो रही थी । किन्तु पुत्र के शरीर का ताप नहीं उतरा ॥ 

सकल रैन नैनन महँ काटी । किरन पानि तर बाटिहि बाटी ॥ 
आह अह हत न आधि बियाधि  ।अहरा न अहरे औषधि आदि ॥ 
सारी रात आँखों में ही अर्थात जाग कर काटी । किरण पति मार्ग,कुञ्ज और भवनों में उतरे ॥ 
आह! दिन के अहिष्ठाता देवता ने भी मन और शरीर के पीड़ा रूपी दानव का वध नहीं किया ॥ 

निवार न रोधि अनु बहु रोगे । अकुल बियाकुल बालक भोगे ॥ 
पुनि गवनै बधु बैदु दुवारे । कहि आले महि भरतिहि कारें ॥ 
रोगाणु रोग फैला रहे थे वे न तो न उनका निवारण हुवा न वे रोधित हुवे । आकुलित यावं व्याकुलित कर वे बालक को ग्रसे 
जा रहे थे ॥ पुन: वधु , वैद्य के भवन गई तो वैद्य  ने कहा को  चिकिसाल की देखरेख में रखो ॥ 

हृत कंप मापि कंठन धारे । बेद राज करि बहु उपचारे ॥ 
सुन सिसु के भर्ति समाचारे । दौउ पहरि पर पिया पधारे ।। 
स्पंदन-मापी को गले में लटकाए  वैद्यविशेषज्ञ ने बहुत प्रकार के उपचार किये ॥ शशु के ऐसी देखरेख के समाचार सुन कर 
दोपहर पश्चात  पिया का  आगमन हुवा ॥ 

पित प्रीत के परस तरस भरन तनुज भव अंक । 
मनहु चातक रैन तरस अंकन बाल मयंक ॥  
पितृ -प्रेम के स्पर्श से पिया पुत्र को गोद में लेने  हेतु तरस रहे थे । मानो पपीहा रात्रि में उगते हुवे चाँद को अंक में भरने हेतु 
तरस रहा हो ॥ 

गुरूवार, २१ मार्च, २०१३                                                                                                  

बोलत बाल मिले अवलोके । अंक भर लिए परस्पर होके ॥ 
भुज दल अंतर बहु पुचकारे । अजहूँ तनु तनि सीतल धारे ॥ 
बालक से बोलते बतलाते हुवे मिले और उसे गोद में भरकर देखा ॥ भजाव मन भरे हुवे उसे बहुंत पुचकारा । अब शिशु का 
तन का ताप थोड़ा शीतलता को प्राप्त कर चुका था ॥ 

दीन भाव धर मुख कर भोरे । प्रिया नैन सन नैनन जोरे ॥ 
पूछे गहि कर आँचर ओरे । का तव चलहु संग महँ मोरे ॥ 
मुख पर भोलापन लाते हुवे, व्यथित भाव से भरे एओ को प्रिया के नयनचार करके आँचल का छोर पकड़ हाथ में लेकर पूछा 
क्या तुम मर साथ मन चलोगी ? 

धीरज के उर उपल धराई । बधु रुप धरी निर्झरी नाईं ॥ 
नयन पटल तल तरि तरलाई । झर झर निर्झर नीर बहाई ॥ 
धैर्य के पाषाण को धारण किये हुवे  ह्रदय से युक्त वधु का स्वरूप मानो पहाड़ी के जैसे हो गया । आखो के सतह पृष्ठ की तलहटी 
द्रवित हो उठी क्योंकि वहां से झर झर करता हुवा जल का झरना  फूट पडा  ॥ 

करज धरे तौ करज अहुटाए । करक धरे तौ करक छुटवाए ॥
जे केरे करेरे कलाई । बदन बचन कछु कहि करुवाई ॥ 
पिया उंगली पकड़ें तो उंगली हटा दे । हाथ पकडे तो कसकर छुटवा ले ॥ जब कठोरता पूर्वक कलाई पकड़ी तो मुख से कुछ  
कुछ कड़वी बात बोले लगी : --

भै रसवंती रस की रूखी । करुर करेरे कह के करुखी ॥ 
नाम धरे श्री दया निधाने । पर दया के धर्म न जाने ॥ 
तो पिया ने कहा है तो रसीली किन्तु रस बिलकुल भी नहीं तो उत्तर में कड़वे करेले कह कर वधु ने तिरछे से देखते हुवे कहा 
-- नाम तो इतना बड़ा रखा श्री दया के भंडारी किन्तु  किन्तु दया का व्यवहार बिलकुल नहीं जानते ॥ 

मुख कांति रमन  प्रभास, दिया प्रिया ससि संग । 
तीनौ के कर्षन कास, पीहू पिया पतंग ॥ 
दीपक, प्रेयषी, चद्रमा के मुख का सौंदर्य वैभव अति दैदीप्यमान होता है ।  पतंगा, प्रियतम एवं 
पपीहा,  तीनों को यह मुखद्युति ही आकर्षित करती है ॥ 

 शुक्रवार, २२ मार्च, २०१३                                                                                         

दहन गर्भ के दाहु न मेटे । एकहु दिवस कहु काहु न भेटें ॥ 
माने हम बहु निगुन समेटे । पर एहि सिसु तव बुढ़तइ खेटे ॥
 किस कारणवश तुम हमसे  एक भी दिन नहीं मिले बताओ तुमे क्रोध क्यों नहीं त्यागा ॥
माना हमने बहुत से दुर्गुण एकत्र किये हुवे हैं । किन्तु यह बालक तो तुम्हारे बुढ़ापे की लाठी है ( फिर
 इससे कैसा बैर )॥ 

मन महँ भरे भार निकसाई । चार कटुक बहु बचन सुनाई । 
एक कंठ रसन बानि मुखरिते । करुर मधुर जने कहाँ कलिते ।। 
भीतर के भारीपन को  हल्का करते हुवे वधु ने पिया को चार कड़वी बात सुनाई । एक ही गले और
एक ही जीभ से वाणी  मुखरित होती है । किन्तु यह वाणी, कड़वी एवं मीठी जाने कहाँ से होती है ॥ 

पाटि पलंग बैसे सकुचाए । पिय मौन श्रवनु  नयन झुकाए ॥    
चित बहु चीते पर कह न पाए । लै बिदाए अरु चरन बहुराए ॥ 
(ऐसे कड़वे वचन सुनकर ) पलंग की पट्टिका पर बैठे  हुवे प्रियवर को बहुत ही संकोच हुवा । और मौन 
धारण कर झुकी आखों से सब सुनते रहे ॥ फिर विदा ले कर वापस लौट गए ॥ 

दुइ दिन औषध भवन बिश्रामे । तहँ लहुट आए पीहर धामे ॥ 
ताप तरत सिसु मांगे दाने । रद छद रुचिकर पयसन  पाने ॥ 
दो दिन चिकित्सालय में उपचारित होने के पश्चात पीहर लौट आई ।। ज्वर के उतरते ही माता का प्रेमरस 
पीने के लिए रोया । और होठ से रूचि पूर्वक प्रेमरस पीने लगा ॥ 

घरी भइ पहर पहरि दिन, दिन भए दुइ चार । 
घरी पहर दिन कर अधिन, लै सत्दिन आकार ॥  
घडिया पहर बनी, पहर दिनबने, और फिर दिन दो चार हुवे ॥ घडियो को, पहरों को एवं दिवस को अधीन करते 
हुवे सप्ताह ने आकार धरा ॥ 

 बारहि बार आए ससुर करें मान मनुहार । 
भए बहु बखत अब बधु तुर पठो दौउ ससुरार ॥  
फिर  वधु के स्वसुर मान मनौवल करते हुवे बार बार पीहर आने लगे वे  कहते वधु को यहाँ रहते  बहुंत दिवस 
हो गए अब उसे तत्काल ही ससुराल के लिए विदा कर दो ॥ 

शनिवार, २३ मार्च, २०१३                                                                                


समझ बूझ पितु सोच बिचारे । धिया पठावन निर्नय धारे ।। 
धिय ते कहि बस अब न एठाहू । रजु तूर जहि जे अति कसाहू ।। 
पिता ने सोच विचार कर समझदारी पूर्वक तनया को ससुराल भेजने का निर्णय लिया । और तनया से कहा अब 
और अधिक अकड़ना ठीक नहीं । अधिक कसोगी तो डोरी टूट जाएगी ॥ 

मंगल कर शुभ दिवस धराए । सुबासिननि कुंवर लेवन आए ।।
दे भेट बहु चारन कीन्हें। बर संग बधू पितु पठै दीन्हें ।।
कल्याणकारी एवं अनुकूल दिवस देख कर पितृ भाव में रहे वाली सुहागिन को उसका सुहाग ले जाने के लिए आया ॥ 
रीति आचार करते हुवे तात -भ्रात ने बहुत से उपहार देकर वर के साथ उसकी वधु को भेज दिया ॥ 

भर अभरन बहु बसन सुबासे । सुभगा सुत धर चलि घर सासे ।।
ससी  बर अम्बर अंत  बिराजे । बधु बर जुग कर भू पर साजे ।।
सुगन्धित वस्त्र एवं आभूषण से सुसज्जित पति की प्राण प्यारी ने पुत्र के साथ ससुराल की ओर प्रस्थान किया ॥ 
जिस प्रकार चद्रमा को वरन किये हुवे अम्बर क्षितिज पर विराजमान है उसी प्रकार वर वधु युग्मन धरती पर 
सुशोभित हो रहा है ॥ 


सुभगा सुत  सह साजन  देखे । रसित सुभाषित सुबिदित लेखे ।।     
असित अभासित लसित ललाई । कनक प्रभासित रयनिहि छाई ।।
पति को प्यारी स्त्री एवं उससे उत्पन पुत्र को उसके पति के साथ देखकर कवि, विद्वान रस एवं कवित्तमयी उक्ति 
लिके लगे ॥ नीलम वर्ण की आभा से युक्त लालमणि के वर्ण को प्राप्त स्वर्ण का  दैदीप्य लिए रजनी अवतरित हुई ॥ 

सुरथ सुहासित सस संकासे  । चकित चकासित कर नीकासे   ।। 
नभस नभ चमस दिसि निसि नीके । निभ निभ  नव अनंगनि ही के ।।
सुन्दर रथ पर मृदु हास्य से अलंकृत चन्द्रवदनी का रूप किरणों के समान दैदीप्त  होकर विस्मित कर रहा है ।। रात्रि में 
गगन का चाँद बहुत ही सुन्दर दिखाई दे रहा है । मानो चाँद का देदिप्त मुग्ध करने वाली प्रियतमा का ही हो ॥ 


अम्बर बर बधु बिधु बियुग भइ बहु कारी रात । 
जब दौनउ दरस संजुग अभरन धारी रात ।। 
आकाश और चाँद के वियोग से तथा वर एवं वधु के वियोग से रात बहुत काली होकर अमावस्या की रात  हो गई ॥ 
जब ये युगल जोड़े में दिखाई देने लगे तो मानो रात ने आभूषण भर लिए हो ( अर्थात वह पूर्ण हो गई ) ॥  

रविवार, २४, मार्च, २०१३                                                                                

बधु अगमन के श्रवन सँदेसे । उदित मुदित सुम अभरन भेसे । 
कहत बिनत करि बन के भोना । अभरन बसन सजन दै दौ ना ॥ 
वधु के आगमन-सन्देश को सुनकर, पुष्प प्रफुल्लित और हर्षयुक्त होकर वेश भरने हेतु उपवन के चक्कर 
लगा लगा कर उससे विनती करने लगे कि हमें सुसज्जित होना  है अत: वस्त्र और आभूषण दो ना ॥ 

दिब्य बसन बन भौतिक भासे । बहुत बरनत माँगे प्रभा से ॥ 
सुमन सुमन भँवरे बन सँवरे । पत पत पग धर प्रियघर भँवरे ।। 
तब उपवन ने प्रभा से बारम्बार याचना करके, अलौकिक वस्त्र और चमकते मुक्तिक मांगे ॥ उपवन के सारे 
पुष्प और भ्रमर इन वस्त्र भूषण को आभरित कर सज सँवरे  और तैयार हो पिया  के घर में पत्तों पर चरण 
रखकर घुमने लगे ॥ 

नीर नुपूर पुर मुकुति माले । तिरन किरन कन कंचन वाले ॥ 
हिरन सकल कल कंठी घाले । लोकत उपवन नयन निराले ॥ 
जल कण के नुपूर और मोती की माला जिसपर सोने के कन झालरों पर झूल रहे थे ऐसे के कल अंश स्वरूप
इन पुष्पों के कंठ में विभूषित यह माला उपवन में अनूठी ही प्रतीत हो रही  थी ॥ 

बहु आगमन के समाचारे । परस पूछ डारि बारहि बारे ।। 
बेर बहुंत भै रयनि ढराई । मंद कांति प्रभा मुख छाई ॥ 
और वधु के आगमन का सूचना-सन्देश को डालियों को छू कर बार बार पूछ रहे थ कि वधु आ गई क्या ॥ समय 
बहुंत हो गया वधु की प्रतीक्षा करते करते रात हो गई । पुष्पों के खिले हुवे मुख पर उदासी छा गई ॥ 

 हरे हरे हर हेरे हारे ।  हिरन सकल कल कंठ उतारे ।।
बोझिल पलक निंदन धारे । शनै शनै सुति गै सुम सारे ॥ 
धीरे-धीरे अवधारित किये हुवे हार को निकालते हुवे समस्त स्वर्ण कणों  को कंठ से उतार दिए ॥ थकी भारी पलको 
पर  नींद का अधिकार हो गया । धीरे-धीरे सारे सुमन निद्रा-मग्न हो गए ॥ 
  


केस रचित कर बिन्यास उरझ सँवारी रात । 
सिख तरु धर बंधन कास कोरि कियारी रात ॥ 
(इधर) बालो की उलझन को सुधारते हुवे उन्हें संवार कर माँग पट्टिका अनुरेखित रूपी दीपक आधार पर किरण रूपी 
लौ प्रज्वलित कर केश- कालिमा को कसके  बांधकर रजनी जोड़ कर क्यारियाँ बनाईं ॥
    
रजत पति रज गज दंती धरे पिटारी रात । 
लवन लौ रुपन रूपवंती साधन बारी रात ॥ 
चाँदी का पत्र चढ़ी हाथी के दांतो से निर्मित पिटारी को ग्रहण किये रात की ज्योतिर आभा, सुंदरी का  रूप धारण करने 
हेतु स्वयं पर समस्त श्रृगार के साधन न्यौछावर किए ॥ 

सोमवार, २५ मार्च, २०१३                                                                                           

पिया की बाटिक के बाटिके । बह बहनु चाक बहिर आटिके ॥ 
गह बधु कुँवर की कटि घाटिके । कमल चरन धरि सकल साटिके ॥ 
पिया का भवन और भवन की वाटिका के बाहर दूर स्थित वाहन के चक्र आ कर रुके ॥ पुत्र के कुल्हे और गले के  पृष्ठ 
को अंक में भरे हुवे साड़ी समटते वधु ने वाटिका में अपने चरण-कमल उतारे ॥ 

 निद्रा मगन सुम बन अवलम्बे । हरि हरि सुत बरि पग धरि अंबे ॥ 
एक छिनु तनि रोदन सुकुमारे । अधर करज धर कहिं चुप कारें ॥ 
सुमन नीद में डूबकर उपवन  के सहारे सो रहे थे । पुत्र को ग्रहण किये हुवे माता ने धीरे धीरे चरण बढ़ाए ॥ एक क्षण के 
लिए जब सुन्दर रोने लगा तो माता ने उसके अधरों  पर उंगली रख कर चुप रहने को कहा ( इस हेतुक सुमनो की निद्रा 
में विध्न न हो ।) ॥ 
  
भँवर पँवर पा पाइल पासे । हंस गमनि हिल हंसक हाँसे । 
सुमन सुत मगन अस न बिलासो । कहे पग पहरि हरि हरि हाँसो ॥ 
पाँव की  ड्योढ़ी पर पायल मंडलित होकर बंधी थी । हंस के जैसे चलने वाली  चलने वाली सुरांगना के हिलाने से उसके
घुंघरू हंस पड़े । सुमन सो रहे हैं अत: ऐसी क्रीडा मत करो चरन पादुका ने कहा थ थोड़ा  धीरे धीरे हंसो ॥ 

कर कंगन कहि काहे काहे । हमहूँ बधू सन लगन लगाहें ॥ 
मनि  मानिक भए लाल भभूके । देखु मूक कहि दै एक ढूके ॥ 
हाथ के कंगन कहने लगे क्यों? क्यों? हम भी तो सुमन के जैसे वधु के दुलारे हैं ॥ तो उनके मणि माणिक्यों को क्रोध आ 
गया । कहे देखो यह मुक्का दें क्या एक दुक्का ॥ 

कुंडल कल बल कंठन रवने । कहे ए न माने कहु करु कवने ॥
लवंग लतिके कहिं बन भोले । चुप रहि कहु तौ सब ही बोले ॥ 
फिर कुण्डल, कोमल मधुर ध्वनि से धीमे स्वर में मीठे से बोले: -- कैसे भी कर लो ये कहे के माने नहीं हैं ॥ इतने  में ही लौंग 
ललाटिकाएं  भोली बन कर बोली वधु ने चुप रहने को कहा  था, देखो सारे ही बोल पड़े ॥ 

मधुर हँसत मसि पथ धानी मिस मलहारी रात । 
नैनन गहन घन पानी काजर घारी रात ॥    
मधुर हंसी से हंसते हुवे काजल की डिबिया को शलाका से मिश्रित कर एवं  मलहारते हुवे रात ने गहन घटा के जैसी  काजल को 
 हाथो से आखो में  उतारा ॥ 
कमल कपोल अधरोपर रुषन अधारी रात । 
रागारुनित रंजनी भर धरी अँगारी रात ॥ 
कमल के जैसे होंठ और अधरों को विभूषित  करते हुवे उन्हें  अरुण राग में रंगकर  रात ने मानो अंगार ही भर दिए हों ॥ 

नभो नयन लट बीथि रथ चाँद उतारी रात । 
रचित खचित नगन नग पथ तरियर तारी रात ॥     
फिर गगन की ऊँची अट्टालिकाओं के छाया पथ पर रात ने रथ पर से चाँद रूपी बिंदिया उतारी  । और पथ के  बहुमूल्य रत्नों 
के सदृश्य नगण्य तारों से ढाँकते हुवे  सजाया-सँवारा ॥ 


मंगलवार, २६ मार्च, २०१३                                                                                        

पार पँवर करि पा पौनारे । अंतर धर घर  भीतर धारे  ॥ 
सकल परिजन जग अगुवन आए । पाउँ परत पर पीढ़ पौढ़ाए ॥ 
 इधर  पद्म चरण से ड्योड़ी पार कर दाग भरते हुवे वधू ने घर के भीतर प्रवेश किया ॥ समस्त गृहजन जाग गए और 
वधु का स्वागत किया । गृहजनों  के चरण स्पर्श  पश्चात आसन पर विराजित हुई ॥ 

नब अंकुर लै बर अँगबारे । भर मुठी फेरि बार उतारे ॥ 
पा अदेस सिसु गोदि बिठारे । चारु चरन निज सयन सिधारे ॥ 
वृद्ध जनों ने नवजात शिशु को गोद में लेकर मुट्ठी भर कर उसकी वार फेरी की ॥ आदेश प्राप्त कर वधु शिशु को गोद में 
लिए वधु के  सुन्दर चरण शयन भवन की और बढ़े ॥ 

सुधा धार सुत सीघ्र सयनिके । लसित बलित  हित रंध यवनिके ॥ 
पाय समउ तै सदन रमनिके । हंस गमन  लखि हरिन नयनि के ॥
अमृत रस का पान कर पुत्र  शीघ्र ही सो गया । वधु ने ओढ़ने के वस्त्र से लपेट कर उसे कीट पतंगों इ बचाव करने वाली 
क्षिद्रयुक्त छतरी से आच्छादित कर दिया ॥ रिक्त समय मिला तो सदन का भ्रमण किया और सुन्दर चाल चलते हुवे 
मृगनयनो  सदन को निहारने लगी ॥ 

मलिन मुख कांति मंद मंदर । बधु मुख छबि पर भए  कमलाकर ॥ 
पट पाटन धर धूरि सकुचाए ।  बधुटि पग पाए झरी मुसुकाए ॥ 
वधु की अनुपस्थिति में दर्पण का मुख मुरझाया हुवा कुछ  उदास सा था । वधु की मुख छवि पड़ते ही मानो वह कमलों 
का सरोवर हो गया ॥ झरोखे एवं द्वार आवरण युक्त पुरछत्ति धुल युक्त होकर संकोच कर रही थी जैसे ही वधु के पैर पढ़े 
धुल को झाड़ते हुवे मुस्कुराने लगे ॥ 

कल कुंतल बल मौलि मुकुलिते । मंद समीरन सरन बिगलिते ॥ 
पैठ पिया पग पाटल पौरे । पीठ तस प्रिया अंक अँकौरे ॥ 
सुन्दर केश वलयित होकर जो वधु के शीश पर अध्बंधे थे । हलकि सुखद वायु के साथ सरकते हुवे खुलते चले गए ॥ 
पिया के चरणो ने छत के द्वार से प्रवेश किया । और चुपचाप पीछे की ओर से  प्रिया को आलिंगित कर लिया ॥ 


हरि चाप युग बर चयनित  सुन्दर सारी रात । 
अम्बरंतर बलित ललित उरस उरारी रात ॥ 
इंद्र धनुष के संकलन से सुन्दर एवं उत्कृष्ट साडी का चयन कर रात ने उसे वलयित कर आँचल को सुन्दरता  पूर्वक ह्रदय में
प्रशस्त किया ॥  


रत रतन मनि सर स्याम रति रतनारी रात । 
नयंगन नयनाभिराम अलि लंकारी रात ॥ 
मणि,माणिक्य, हीरे, नीलम आदि रत्नों से युक्त होकर अनुरक्त हो रात  लावान्यित हो उठी । विभूषित रात , आँखों को प्रिय 
लगने वाली मुग्धा सखी सी प्रतीत हो रही थी ॥  
  
बुधवार, २७ मार्च, २०१३                                                                                             

धरे परे पद परिहर अंके । करे सहुँत पिया भरे लंके ॥ 
कोप कुपित अरु अरुनत नीचे । प्रणय कर्ष प्रिय अंतस  भीचे ॥ 
वधु ने आलिंगन छुड़वाकर  चरण फेर लिए  तो पिया ने कमर पर से आलिंगन कर पुन: सामने ले आए  ॥ नीचे की और 
झुकी हुई लाल आँखें प्रणय- कलह के कारण रुष्ट प्रतीत  हो रही थीं ।  तो प्रियतम ने प्रणयातिरेक में प्रिया को ह्रदय से लगा
लिया ॥  

बहुस समउ पर पा पिय परसे । नीर नयन रज नीरज बरसे ॥ 
अधो गमन पत पलकन नीके  । आह आ करे  असिक रसीके ॥ 
बहुंत समय के पपश्चात प्रियतम का प्रणय-स्पर्श प्राप्त होने के कारण नयो में नीर विराजित होकर मोतियों के सदृश्य बरसने
लगे ।  पलकों पर विस्मय भरते ये सुन्दर  मोती  से नीचे को ओर आते हुवे  होंठ और ठुड्डी के मध्य स्थान को रसात्मक कर 
रहे हैं ॥ 


पिया परस कर प्रथम अलीके । तहँ सहुँ मुख करि बाहु बलयिके ॥ 
उपरोतर धरे अधर असिके ॥ अधरोपर लै रस रस लसिके ॥ 
पिया ने पहले तो माथे को स्पर्श किया फिर बाहू में वलयित करते हुवे मुख आगे करते हुवे माथे से अधर उतार कर असिक 
पर रख दिए । और फिर अधरों से लिपटते हुवे रस रूपी अमृत का पान करे लगे ॥ 

भुज अंतर कर पौढ़ पलंगे । अरस परस दो भए एक संगे ॥ 
हरि हरि हर  हरिचाप के रंगे । रयनि कर रंग कार भुजंगे ॥ 
ततपश्चात गोद में लेकर पलग पर लेटाया और आलिंगन बद्ध  होकर  दोनों एक में मिल गए । धीरे धीरे  इंद्र धनुष के सात रगों 
को ग्रह कर  रयनी ने रंगों की कला कृति ऐसी कलाकृति की कि आठवें रंग की रचना हो गई ॥ 

हँसक नादत पद गमनै  रुप धर नारी रात । 
लब्ध बर लावन लखिनै लस लहकारी रात ॥    
हंस के समान कलरव ध्वनी उत्पन कर मोहक चाल चलती रात ने  नारी  का रूप धरा कर लिया और अत्यधिक सुन्दरता को
अर्जित कर उससे उद्भूत होती  आग की लपटों सी दिखाई दे रही है ॥ 

सोलह साधन सन सँवर सुभ सिंगारी रात । 
लोकित रोचित ललित बर बहुँत न्यारी  रात ॥ 
श्रृंगार के सोलहो शुभ साधन से सुसज्जित रात सौंदर्य की श्रेष्ठता को प्राप्त कर बहुत ही न्यारी और प्यारी लग रही थी ॥ 

गुरूवार,  २८ मार्च, २०१३                                                                          

अपूरब रूप धर अंतर रात  । जोगे जगत पुर पंथ प्रभात ॥ 
प्रात पाद जस पधरित  पँवरे । कर मँह गह कर सँग सँग भँवरे ॥  
अद्भुत एवं अद्वितीय सुन्दर स्वरूप को प्राप्त कर रात, ससार के द्वार पथ पर प्रभात की प्रतीक्षा कर रही है ॥ जैसे ही प्रात: के चरण 
ड्योडी पर पधारे । तो रात और प्रात  हाथो में हाथ लिए साथ-साथ घुमने लगे ॥ 

दिन के रथ रवि रथिक अरोही । अरुन सूत सथ चले बटोही ॥ 
नियतन रसरी किरन के रासि। सप्त अश्व के मुख कर कासि ||
दिन के रथ में रवि रथारोहीत होकर  रथ के सारथी अरुण के साथ  यात्रा पर निकल पड़े ॥ रथ की नियंत्रक रस्सी किरण पुंज हैं 
और इस किरणपुंज को सात घोड़ों के मुख से सारथि के हाथ में कसी हुई है ||॥   

बाह चरन पथ  बिम्बित लोके । कहे रथी रथ सारथि रोकें ।। 
श्रवन रथिक के नम्र अनुराधे ।  संचरि चरन रन रस्मि साधे ।।    
घोड़ो एवं चक्रों सहित रथ का प्रतिबिम्ब मार्ग पर दिखाई देने लगा । रथारोही ने कहा हे सारथी ! रथ को मार्ग पर स्थिर करें ॥ 
रथिक के विनम्र अनुरोध को सुनकर सारथी  ने मार्ग पर, रथ के चक्रों की गति को घोड़ो से बंधी रस्सीयों से साधा  ॥ 

 कहरथी  देखु   रयनि प्रभाते । समित रमित रत रमनित साथें ॥ 
रतिवर रतिगर रति रूपा । एक जग मोहिनि दुज सुर भूपा ॥ 
रथारोही ने कहा रात और प्रात को देखो तो  एक प्रेम पाश में आबद्ध  परस्पर संयुक्त होकर कैसे एक  साथ विचरण कर रहें हैं ॥ 
प्रभात, कामदेव का रूप हैं तो रात रति का ही स्वरूप है । एक मोह कारीणी शक्ति स्वरूपा लक्ष्मी हैं तो दुसरे विष्णु का स्वरूप है ॥ 

सहस नयन अस दरसन देखे । चितचौरन चित चित्रकर  लेखे । 
देखि रथिक अस सूत मुसुकाए । कासित किरन रन चरन बढ़ाए ॥ 
सात रथों के आरोही सूर्य देव ऐसे दर्शन का साक्षात्कार किया । और इस मनोहारी  चित्र को चित में आलेख कर अंकित कर लिया ॥ 
रथ वाहित को ऐसी मुद्रा में देखकर सारथि अधर मुस्कराए । और पुन: घोड़ों से बंधी किरण रूपी रस्सी को कास कर रथ के चक्रों को 
गति प्रदान की ॥ 

भब्य भूमि मंडल भुवन राज गगन दिननाथ । 
भावै जुगत भवन भवन भव भूषन दिन नाथ ॥ 
भव्य भू मंडल लोक में गगन पर गगन पर सूर्य का राज है । और वे भवन-भवन के चिन्तक संसार के भूषण स्वरूप हैं  ॥   

मढ़ मनि सर स्याम रतन सिंहासन दिननाथ । 
राजित बिदुर सहि भासन  भू राजन दिननाथ ॥  
सूर्य का सिन्हासन नीलम हीरे जैसे रत्न किरणों से खचित है। राज्य के कुशल विद्वाओं के साथ भूमि को प्रकाशित करने के लिए जिस पर विराजित हैं ||॥ 

नय विद न्याय परायन नय नियमन दिननाथ । 
देहरी के दीपक बन सभा सदन दिननाथ ॥ 

दिन के अधिष्ठाता, नीति विशारद  न्याय परायण,  मार्ग दर्शक एवं नियंता हैं ।। 
सूर्य,सभा सदन में देहली का दीपक अर्थात समान न्याय वादी के रूप में विराजित हैं ।। 


करमन जन दै अन्न धन दिब्य बसन दिननाथ । 
 देखत दरिद दुःख दीनन सहस नयन दिननाथ ॥ 

सूर्य देव, कर्मष्ठ जन हेतु सुख एवं वैभव के प्रदाता हैं । दारिद्र एवं कष्ट प्राप्त लोगों को 
सहस्त्र आँखों से देखते हैं ।।  

शुक्रवार, २९ मार्च, २०१३                                                                                              

समर सुयस  समराट  के सुबर्निम राज काल । 
बस्तु भरे बर हाट सुख संपद घर घर घले ॥ 
युद्ध  में विख्यात राजाओं के राजा सूर्य देव के अतोत्तम शासन काल में बाजार श्रेष्ठ वस्तुओं से भरा है और घर घर 
 सुख की संपत्ति से पूर्णित है ॥ 

बीर सुर  के लिलाट तेज मूर्ति  तिलक लाल । 
दे कुटिल कंठ काट हीन हेतु भए बहु भले ॥ 
वीर सूर्य के मस्तक पर तेज स्वरूप लाल तिलक सुशोभित है । राजन कुटिल के लिए काल हैं और दीनो पर दया 
करे वाले है ॥ 

बावरि बहु बावरी कहुँ सेल देही बिसाल । 
निर्झरि कहुँ निर्झरी बहु मनि मुकुति माल बले ।। 
( इनके शासन में ) बावली बहुत ही भरी हुई हैं और कहीं पर विशाल पर्वत विशाल स्वरूप में स्थित हैं । कहीं पहाड़ी से 
मणि- मोती की माला से वलयित जल कणों  से भरा झरना प्रस्फुटित हो रहा है ॥ 

कोटि कोटि कोटिके कहुँ कोटि कोट पाल । 
चौहटि बट हाटिके कहुँ रथ चारु चाल चले ॥ 
कहीं पर बहुंत सारे भवन है तो उअकि सुरक्षा हेतु बहुत से पहरी भी है । कहीं चौक युक्त स्वर्णिम मार्ग है जिस पर सुन्दर 
रथ चले जा रहे है ॥  

बाटि के बर बाटिके रमत रमनीक ताल । 
घाट घाट घट टिके कहुँ उद बिंदु भर भर निकले ।। 
मार्ग के ऊपर सुन्दर वाटिकाएं हैं और मुग्ध करने वाले भ्रमण करने योग्य तालाब हैं । कहीं घाटो पर कुम्भ रखे हैं  और 
कहीं वह जल बिंदु संग्रह कर बाहर निकल रहे है । 

जलनिधि तप घन करे कहुँ कर नहीं अकाल । 
कन कन धनकर भरे पुर जनों के भवन ढले  ॥ 
समुद्र तपित होकर बहुत ही बादल करते हैं कहीं पर भी अकाल नहीं है खेत खलिहान अनाज ऊपज से भरपूर हैं और नगर 
वासियों के ढले हुवे भवन हैं ॥ 

शनिवार, ३० मार्च, २०१३                                                                                         
बधु बर नागर अस रउ धानी । जहँ भइ अस एक भोर सुहानी ॥ 

ज्योतिर पथ रथ रवि प्रकासे  । दिन निकरे कहि सब संकासे ॥ 
वधु-वर ऐसे राजा की राजधानी के नागरिक है । जहा ऐसी ही एक सुखद भोर हुई ॥ आकाश में सूर्य का उदय हुवा । 
पडोसी कहने लगे भई दिन निकला ॥ 

पोखर पोखर पुरइन बिकसे । पटल बरन बर पाखुर निकसे ॥ 
नभो गति गमनु नयन नभौके  । नौचर चारन नियसत नौके ॥
तालाब-तालाब में कमल के पुष्प विकसित हुवे । सुन्दर गुलाबी रंग लिए हुवे उनकी पखुडियाँ निकल आईं ॥  
विचरण करने हेतु पक्षीयों  की आँखे आकाश की और देख रही थीं । नाविक नौकाओ के संचाला की तैयारी कर रहे थे

उदउ  बधुटि करि नीर निमज्जन । धरे चरन बन अवतरि छज्जन ॥ 
 लैकरजल कल सुत सुत  सींचे । उयउ कुसुम दल दृग मलि मीचे ॥ 
जागृत होकर प्रात: के स्नानादि नित्य कर्म कर वधु के चरण दुछत्ती से उतर कर उपवन में पधारे । नल से मोती रूपी जल की 
बूंदों से को लेकर जब सोए हुवे पुष्पों के मुख पर छींटा । तो सारे पुष्प बंद आँखों को मलते हुवे उठ बैठे ॥ 

रुद्र छुद्रा बली कलबल कारी । कर महँ धारी पूजन थारी ॥ 
कंज कलस कण कंठन नादे । चले अराधन  मोहन राधे  ॥ 
और रूद्र ग्यारह ग्यारह अंकों की घंटियों से गुंथी मालाएँ से सुसज्जित पूजा थाली  हाथ में थी । कलश के अमृत कण कलश 
के उपर उठ कर मधुर स्वर में कहने लगे कि हम राधे-मोहन की आराधना करने चले ॥ 

गई बहुरि बधु बहुस सुख पाए । पर बिनु अभरन सुमन सकुचाए ॥ 
एहि जान बधु  दैइ उपहारे । बाँधे कंठन मनिसर हारे ॥ 
गए हुवे सखा को पुन: प्राप्त कर यूँ तो सारे सुमन बहुंत ही हर्षित हुवे कितु वेश भूषा से रहित होकर वधु से मिलाने में उन्हें 
बहुंत ही सकोच हो रहा था ॥ ऐसा जा कर वधु ने जल्कानो स युक्त हीरे का सुन्दर हार उनके  गले में पहनाते हुवे उपहार 
स्वरूप प्रदान किया ॥ 

कंठ कलित  कर कुसुम प्रफूले । सुख आसन गत गंधत झूले ॥ 
पत सन कंजन चरनन चिन्हे । थरित अवतरित मंगल किन्हें ॥ 
कंठ को विभूषित कर कुसुम बहुत ही प्रसन्न हुवे और डालियों के झूले में सुगंध बिखराते हुवे लहलहाने लगे ॥ पत्तो के साथ अमृत 
तल पर जब चरण उद्धरित  किये तो पूजन थाली ने आगंतुक का श्रद्धा पूर्वक स्वागत किया ॥ 

पत्र पुष्प फल थल पुष्कल गंध राज दल काठ  । 
बलकल  कलस तल दृडजल बधु  करि पूजन पाठ ॥ 
पत्र, पुष्प, फल अगर  और चन्दन के मिश्रण से परिपूर्ण थाल में असितफल के तल में कलश देश रखे वधु ने  प्रात : काल में पाठ 
करते हुवे पूजा की  ॥ 

रविवार, ३१ मार्च, २०१३                                                                                              

पेखत पुहुप बधुटि पहलौठे । कहे आह का सुन्दर ठौटे ।। 
अरु कहि सुत अंग मृदुल कैसे । बोली बधु तुर तुम्हहिं जैसे ॥ 
तत पश्चात पुष्पों ने वधु के प्रथम गर्भोत्पाद  को देखते हुवे कहा, अहा ! क्या सुन्दर पुत्र है । और कहने लगे पुत्र के कोमल 
अंग प्रत्यंग कैसे हैं ? तो वधु इ शीघ्रता पूर्वक उत्तर दिया तुम्हारे ही जैसे॥ 

अधर कपोल जुगत अनुरागे । जस तव पल्लब लाखन लागे ॥ 
अखि गत पखमन  नीक नासिके । तव अलि नंदन नलिन नालिके ॥ 
 पुष्पों ने पुन: पूछा : - होठ और गाल पर अरुणाई कैसी है ? तो बधू ने उत्तर दिया जैसे तुम्हारे कोपलें ललाई लिए हुवे हैं ॥ 
फिर पूछा भौं और नाँक की सुन्दरता कैसी दिखाई दे रही हैं । तो वधु ने  कहा उद्या में जो तुम्हारे मित्र कमल हैं उन्ही के 
नलिका के जैसी  ॥ 

बाल भाल बल काल कलिन्दे । अरु ललित बहित अलिक अलिंदे ॥ 
पलक बली बल नयनन बृंदे । अरु अर्नव तव अलि अरविंदे ॥ 
माथे के कुंडलित केश काली यमुना  के जैसे है । तो वधु ने कहा  और माथे के छज्जे पर बहते हुवे से  सुंदर लग रहे हैं ॥ 
पलाकावली से घिरे नयन समूह वे कैसे है ? तुम्हारे मित्र जल के कमल के आखों के जैसे ॥ 

करक कलस तल अति लघुताई । जनु  को कुसुम कली कल्लाई ॥   
चारु भेस भर चरनन चारे । जस तुम दोलत दंठलि डारे ॥ 
छोटी  सी अंजुलि और छोटी सी हथेली कैसी है ? जेसे  कोई नई कलि की कोपले हों ॥ उत्तम वस्त्र धारी के चरण कैसे संचालित 
हो रहे हैं । वधु ने कहा : -- जैसे तुम डालियों की दंथाली पर लहलहाते हो ॥ 
  पूछे पुहुप बहु कर किलकारे । कहु त सिसु के नाम का धारे ॥ 
नाम तेहिं हम धरें बिसेसर । लघु रूप मह कहे इसू घरभर ॥ 
ऐसा सुनकर सुमन बहुंत किलकारी भर कर पूछने लगे, कहो तो बालक का नाम क्या रखा है ?? इसका नाम हमे विश्व्वेश्वर 
रखा है और छोटे स्वरूप में घरभर में इसे ईशू कहते हैं ॥ 

सुगंधित संधु गंध बंधु मोह राज रसे रासिते । 
निरखत नंदन नन्द बदन हंस नाद हँसे हर्षिते ॥ 
बालक मोदित  कभु रुदरित बहु रोचित लखित लालिते । 
गोदी पलवन जनी ललन अपूरब नयन रूप पालिते  ॥ 
आम, चम्पा, बेला,मोगरा,चन्दन, गुग्गुल आदि सब साथ में सुगन्धित होकर कोलाहल कर रहरहे है । 
वाटिका नंदन  का मुख देखते हुवे हंस के समान  कलरव कर हर्षित होते हुवे हास्य मग्न हैं ॥ 
बालक  प्रसन्न होताहुवा , कभी रोता हुवा, बहुत ही सुदर एवं मनोरंजक लगता । 
दुलारे को  गोद पाए हुवे माता रूप  पालनहारी के स्वरूप अद्भुत दिखाई दे रहा है ॥ 
  रीति पूरन परिजन घर द्विज राजन बुलाए । 
सुभ दिवस अति मंगल कर पूजन कूप धराए ॥  
पुत्र जन्म की रीती आचरण के परिपूरण हेतु परिजनों ने वेद-विद्वान को घर बुलाया । 
विध ने अति कल्याण कारी शुभ दिवस को  कूप पूजन हेतु निर्धारित किया ॥

    




 







































  








Friday, March 1, 2013

----- ।। सुक्ति के मनि 3।। -----

शुक्रवार, ०१ मार्च, २०१३                                                                                         

लाल नील मसि कारिख राखे । कृतिकार कबित कँह बहु भाखे ॥ 
अखर सिन्धु पा हिमबर काँखें । नौ रस राज लावन लाखें ॥ 
लाल, नीली और साँवरी अम्बु धारण किये  कवियों एवं रचानाकारों ने विविध  भाषाओं में कथन करते  हुवे सागर से मनोवांछित  अक्षर स्वरुप मोतियों  को प्राप्त कर नौ रसो के राजा अर्थात श्रृंगार रस के सौंदर्य का वर्णन किया ॥ 

कापर करतल धुरी जल धोए । आखर धूरि धुरे ज्ञान भिजोए ॥ 
आखर शोषन जर कन झारें । बुध रस राज  कहें बिसतारे॥ 
कपडे की धूल हथेली से जल के द्वारा धुलती है। अक्षरों की धूल ज्ञान की अनुरक्ती  से धुलती है ॥ जलकणों को झाड़कर अक्षरों को सुखा विद्वान कवि रस राज को विस्तारपूर्वक कहते है ॥ 

सुन्दर बर सुचि रूप सुरूपा । कबि बिकिरत कर अर्न अनूपा ॥ 
पञ्च बिषय जस कार कलेबर । रसन श्रवन दिसि गंध परस भर ॥ 
सौदर्य के श्रेष्ठ रूप के पवित्र स्वरूप को कवियों ने  अक्षरों की किरणों अनूठे स्वरुप में प्रस्तारित किया है । शरीर आकृति जैसे पांच विषय इन्द्रियों  दर्शन,श्रवण, स्वाद, स्पर्श एवं गंध से युक्त होती है ॥ 

रसन रस दोउ करूर मधुरे  । श्रवनन रस कर्कस कल कूरे ॥ 
गंध गहन सुरभित दुर्गंधे । रूप कुरुप दिसि रज कर बंधे  ॥ 
स्वाद में द्वि स्वरूप के होते हैं कढुवा एवं मीठा । श्रवण ग्रथि में कर्कस एवं मधुर ध्वनि राशि का रस होता है ॥ गंध, सुगंध एवं दुर्गन्ध ग्रहण किये हुवे है । और दर्शा रूपता एवं कुरूपता के रश्मि कणों में बंधे है ॥ 

अस ही बिरहा रस सिंगारे । एक बिरहा दुःख एक सुख सारे ॥ 
दुख रंग अनुराग बिधाना । सुख रंजन रति भाव प्रधाना ॥ 
बस ऐसे ही श्रृंगाररस का विरहरस द्विरुपी है । एक विरह दुखमयी है तो एक सुखमयी ॥ दुखमयी विरहा के रस का जो स्वरूप है
वह अनुराग का विधान है ।  और सुख मयी विरहा मन रति की भाव प्रधानता है ॥ 

बिषय बिदित बिदु कहत बियोगे । एहि पर बधु दुःख बिरहा रोगे ॥ 
घरी घरी घन नयन बन छाए । भरी भरी हाय जर झरकाए ॥
वियोग के सन्दर्भ में इस विषय के कुशल कवियों ने कहा है कि यहाँ पर वधु दुखमयी विरहा के प्रसंग से पीड़ित है । प्रतिक्षण बादल नयनो के उपवन में छाए रहते है और हाय! भरे भरे से ये घन जल वर्षा करते हैं ( जो दुखमयी विरह का लक्षण है) ॥  

नयन पीठ पट बारि बर उर बन कन कन कूर । 
जुते हलबल हलि हलधर बिकसे रागन फूर ॥ 
नयन के पलक पृष्ठ का वरण कर वर्षा ह्रदय के उपवन में बूँद कणों का ढेर लगा दिया । हलचल रूपी किसान द्वारा ह्रदयक्षेत्र पर जोती हुई क्यारियों में अनुराग के पुष्प प्रस्फुटित हुवे ॥ 

शनिवार, ०२ मार्च, २०१३                                                                        

आपन बाल गर्भ धरि बाले । निठुर पिया बधु देखि न भाले ॥ 
जिन के बिनु एक छिनु नहि रीते । तिन कै बिनु अब रत दिनु रीते ॥ 
एक तो बधू की स्वयं की बाल अवस्था फिर गर्भ में बालक और पीया की कठोरता कि वह देख-भाल भी नहीं करते ॥ जिन के बिना कोई भी क्षण रिक्त नहीं था उनके बिना अब दिन-रात भी रिक्त हैं ॥ 

बिरहा नाना बिचारु बिठाए । बहु जिय जराए जग जी उठाए ॥  
कार कलप जग जहँ तहँ ठाढें । बढ़े न आगिन रयनि न गाढ़े ॥ 
विरह अवस्था में मन के भीतर विभिन्न प्रकार के विचार आते हैं जो मन को बहुंत ही जलाते हैं और संसार विरक्त सा लगने लगता है ( मन इस प्रकार की अनुभूति करने लगता है कि )  जगत के क्रियाकलाप जहां हैं वहीँ रुक जाएँ आगे न बढ़ें रात भी और ना गहराए ॥ 

को कर नाथ कहु प्रीति जोरी । दीनु उर भर नयन जर घोरी ॥ 
कास पाख रहिं सस के पोषे । तम गुण पिय काहू हुवे सोषे ।। 
हे नाथ ऐसी प्रीति किस कारण से जोड़ी ।  आँसू में घुल कर जिसने ह्रदय में दुःख भरा ।। हे नाथ आप तो शुक्ल पक्ष के स्वरूप थे जो चन्द्रमा को बढ़ने वाला अर्थात प्रिया को निखारे वाला था फिर क्यों कर आपने कृष्ण पक्ष का गुण धारण किया और चन्द्रमा के शोषक और प्रिया के मंद कान्त बने ॥ 
   
सीत सरन ना जरन हिया के । जाग नयन भी सपन पिया के ॥  
सुमिरै पी बधु जी भरि भरि के । बूँद बूँद भर नयनन ढरके ॥ 
इस प्रकार प्रिया का जलता हुवा ह्रदय शीतलता को प्राप्त नहिं हो रहा था  जागते हुवे भी पीया के स्वप्न आ रहे थे भरे ह्रदय से वह पिया का स्मरण करती । और बूंद बूंद कर नयों से जल बहाती ॥ 

एक ठोर सरित जल की धवनि कल कल की मुकुति भुज दल धरे । 
बलयित बर्तिक बल दीप तैल तल जल धरा उजवल करे ॥ 
कल कलश कंचन प्रियतम अंकन कृष्ना अभिसारिका । 
सीस खंखर बर स्याम सुन्दर राग मुद्रा धर राधिका ॥  
एक  छोर  पर  अदि  के  जल  की  ध्वनि कलरव करती बूंद मुक्तिक  को हाथो में धरा किये हुवे है ।  वलयित वर्तिका  स्निग्ध तरल की सतह  पर  दीपक के सह वलयित होकर जलाते हुवे धरा को उज्जवल  कर रही है कंचन युक्त सुन्दर देवालय में प्रियतम  के आलिंगन यह प्रियतमा अँधेरी रात्रि में अभिसार करने वाली है। और शीर्ष पर घंटिका की ध्वनि से युक्त श्री श्याम सुन्दर  का वरण किये राधिका आकर्षक मुद्रा धारण किये हुवे है ॥ 

एक ठोर दुइ निलय नयन दोउ घेरे उदास । 
एक घेरि घन घन बिरहन दुज अँधेर आकास ॥       
तो एक छोर पर गृह एवं गृहाक्ष तथा हृदय एवं हृदयाक्ष दोनों को उदासी घेरे हुवे है । एक को विरह रूपी  सघनघन ने घेरा है दुसरे को आकाश के अँधेरे ने घेरा है ॥ 

निर्झरी झर तर तलहट सागर तट मिल जाए । 
जे तरी झर नैनन  पट ताके कौन मिलाए ॥ 
झरती हुई नदी तलहटी से उतर कर सागर तट म मिल जाती है । यदि यही पलक से उतरे तो फिर इसका मिलान कहाँ हो  ॥ 

रविवार, ०३ मार्च, २०१३                                                                                         

निसमत दिन रत रति रितु सिराए  । एक दिवस हाय पिया न आए ॥ 
चाहि लेख तैं कछु बात कहै  । लिख न पाए रही पात गहै  ॥ 
ऋतु दिन रात पर अनुरक्त हो समाप्त होती दिख रही है और प्रियतम है कि एक दिवस को भी नहीं दर्शे ॥ वधु ने लेख के द्वारा ही कुछ बात कहना चाही किन्तु कवल पत्र पकड़ी रही लिख कुछ भी नहीं पाई ॥ 

कहुँ पत ते कहुँ पिय बिसराई । अखर जननी कहुँ आखर गँवाई ॥ 
निसा सकल मसि मल मल मीसी । मंद प्रभा मुख धानी रीसी ॥ 
कहीं पत्र ने तो कहीं प्रियतम ने भुला दिया कही लिखनी तो कहीं अक्षर खो गए । निशा ने सारी मलिनंबू मल मल कर मिश्रित का लिया मसि ढाई का मुख रिसते हुवे मुरझा  गया है ॥ 

 को जोर जुगति  कोउ उपाए । हिय के लाए कस पिय पहुँचाए ॥ 
बधु  भाव भास न बिधु बिभासे । बर कासे न बिभा कर कासे ॥ 
न कोई जोड़ -जुगाड़ न ही कोई उपाय सूझ रहा की वधु ह्रदय की जलन प्रियतम के पास किस प्रकार पहुँचाए ॥ वधु के पास न तो कोई मित्र  ही कोई परिचित नहीं था  उधर चन्द्रमा कातियुक्त था वधु वर के आकर्षण में नहीं थी, चद्रमा सूर्य  के द्वारा प्रकाशित हो रहा था और भोर हो गई ॥ 

बार बिरत न बारता लापे । बाल करत बहु गर्भ कलापे ॥ 
निसदिन नियता नव नटि कारे । इत भाल उतर पत कटि धारे ॥  
दिन बिता पर प्रियतम से कोई वार्तालाप न हुई इधर शिशु गर्भ में बहुंत सी क्रिया कलापे कर रहा था  नियंता प्रत्येक दिन नई नई क्रियाए करता इधर शिशु का सिर नीचे उतर कर जानी की कति में स्थापित हो गया था अर्थात प्रसव काल समीप था ॥ 
   
न धीर परे न पीर परे पर परे परे पिया । 
न धीर धरे न पीर हरे पर हरे धरे हिया ॥ 
न धैर्य ही ठहरता न पीड़ा जाती किन्तु इस पर पिया भी दूर दूर है । तो वे धैर्य देते न पीड़ा हरते और ह्रदय हरण किये हुवे है ॥
   
दरस बिधु  दीन मगन निसिथ के नयन नीर बहे । 
दिरिस दीन बनसुमन मंद कांति मुख मुकुलित ॥
चन्द्रमा व्याकुलता से भरा हुवा दर्शित हो रहा है, आधी रात्रि में उसकी आखें अश्रु पूरित होकर  बही जा रही है वन वाटिका के सुमन का मुख भी मुरझाऐ हुवे से अधखिले रूप में दर्शित हो रहे है ॥ 

 सोमवार, ०४ मार्च, २०१३                                                                                  

जे नहि परने तेहिं परनाए । बिपरीत बयस बहु नाच नचाए ॥ 
नीर निहारे नयनन हारे । भर भर भीतर भारहि भारें ॥ 
जिसे कभी प्रणाम नहीं किया विपरीत स्थिति उन्हें भी प्राम करवा कर बहुंत ही नाच नचाती है ॥ आँसुओं को निहार निहार कर नयन भी हार गए । और इनका बोझ उठा उठा कर अंतस भारी हो जाता ॥ 

भै एकु रत जन तिथित बहोरी । बधु बिकलित पीर धरी घोरी ॥ 
जान भए न जिन्ह होइ जाई । जिन्ह के रजस देहु जनाई ॥ 
फिर जन्म तिथि अंकित कर एक रात हुई वधु घोर पीड़ा से व्याकुल हो उठी ॥ जिनकी संतान को औरजिनके रज से वधु देह स्वरूप जन्म देंने वाली थी वह ही नहीं जाने कि पीड़ा हो रही है ।। 

जान भावज कहीं धीर गहें । एहि प्रसव पीर तनि पीर सहें  ॥ 
प्रथम दरस तव प्रथम अनुभूति । बढ़त जान दौ पीर बहूती ॥ 
भावजों ने प्रसव पीड़ा को ज्ञान कर कहा कि धैर्य रखें । यह प्रसव की पीड़ा है इसे थोड़ा सहें ।। यह तुम्हारा पहला दृष्टांत एवं पहली अनुभूति है । अभी पीड़ा को अधिकाधिक बढ़ने  दो ॥ 

 बेर बखत भइ रत दुज पहरे । घेरे घिर बधु चिंतन गहरे ।। 
राम राम करी राति बिताए  । पीर दसा अस बरनत न  जाए  ॥ 
समय अधिक हो कर रात का दूसरा पहर हो रहा था  । वधु गहन चिंता के घेरे से घिरी हुई थी । राम राम करके वधु रात व्यतीत कर रही थी । पीड़ा की स्थिति ऐसी थी कि  जिसका  वर्णन करना कठिन हो चला ॥ 

कल कपोल राग भए पीत जाग उदर अंग पीर गहे । 
कभु छाजु टहल कभु पालौ बल पलकन छम छम नीर बहे ॥ 
बन सुमन कलित लोचन ललित ब्याकुलित बधु निरख रहे । 
बहु बरत उरस भीत भरे तरस रहें निरबस त कछु न कहें ॥      
गालों की अरुणाई का सौंदर्य जागृत अवस्था में एवं उदार की पीड़ा सहते सहते कांतिहीन हो गया । कभी छत पर तो कभी पलंग में बल लेते हुवे वधु की पलकों से आँसू टपक रहे थे  ॥ व में सुशोभित कुसुम के सुन्दर नयन वधु की ऐसी व्याकुलता को निहार रहे थे । 
भीतर  तरस से भरा उनका ह्रदय भी पीड़ित हो उठा पर निर्वशता के कारण वे कुछ कह ना सके ॥ 

पेखि बधु के पीर सुमन बिनत करे कर जोर । 
हे हरि तमोहर तत छन  प्रगस हो धरी भोर ॥ 
वधु की पीड़ा को देख कुसुम हाथ जोड़ कर विनती करने लगे । हे सुरु हे अँधकार के हरण कर्त्ता तत्काल 
धरा पर भोर को प्रकट करें ॥ 

नादे नंदन नलिन मुख जागे सहस लोचन । 
रथिक सारथि रबि मयूख  देखु तरे धौल गिरि ॥  
इंद्रउद्यान के कमलों के मुख हर्ष ध्वनि कर कहे 'सूर्यदेव जागृत हुवे' । रथ पर सारथी अर्थात अरुण, रवि और उसकी प्रभा आरोहित है ।देखो वे हिमालय पर्वत पर उतरे ॥ 

मंगलवार, ०५ मार्च, २०१३                                                                                         

साद गहन सह पेट पिटारी । अलस भोर महु उतर अटारी ॥ 
बैस बहनु बह सह बही जाए । बारही बार कोख कसकाए ॥ 
कोख में अवसाद ग्रहण  किये हुवे तड़के ही बहुखंडी भवन से उतरी और वाहन में बैठ कर हवा से बाते करती दूर होती चली गई । बारम्बार उसकी उदर कोष में पीड़ा का प्रवाह हो रहा था ॥ 

जस तस औषध आले पैठे । प्रसवंती वधु रह रह ऐंठे । 
पात्र प्रसादु कह पट पितराए । प्रसव सदन सीध चरन सिधाए ॥ 
जैसे तैसे करके उसे औषधालय में प्रवेश किया प्रसव वेदना से ग्रस्त वधु घरी-घरी ऐंठ रही थी । अपने  कृपापात्र पूर्वजों के सम्मानार्थ शिरोवस्त्र का आचमन कर वधु के चरण  सीधे प्रसव स्थल की ओर बढ़े ॥ 

ततक्षन परे पीर तै पीरे । नव जी जन्मे धीरहि धीरे ॥ 
प्रथम सिसु के सिर तीर तीरे । भयौ बहिर तहँ सकल सरीरे ॥ 
तत्काल ही पीड़ा पर पीड़ा उठने लगी । धीरे-धीरे अव जीवन का जन्म होने लगा ॥ सर्व प्रथम नवजात का सर बाहर निकला फिर सम्पूर्ण  देही बाहर आ गई ॥ 

गर्भ गरल जल नाभिक नाले । तर धरनी तल बाँधित बाले ॥ 
बाँधि मूठ रुदन करे भारी । भूखन भोजू दौ महतारी ॥ 
गर्भ में जो भी विषामृत था वह नाभिका नली सहित बाहर आ गया जिसके साथ बंधकर ही शिशु धरती पर उतरा ॥ मुट्ठियों को बांधे वह बहुंत ही रोदन करते हुवे माता से भोजन की आकांक्षा कर रहा था  ॥ 

उत महतारी पीर अपारे  । गर्भ न धरूँ कह किरिया पारे ॥ 
सदोजात लै हँसी भौजाए । पुतवती भई कहीं मुसुकाए ॥ 
इधर माता शुशु का  ध्यान न करते हुवे अपार पीड़ा से विमुक्त होते सौंगंध कर रही थी कि अब वह कभी गर्भ धारण नहीं करेगी । तत्काल उत्पन्न हुवे शिशु को गोद में लेकर भावज हँसने लग गई और पुत्रवती हुई यह 
कह कर मुस्कराने लगी ॥ 

 नंदत नभ कर रागन रंगे । श्रुति कन कोटर कूज बिहंगे ॥ 
निर्झरी नीर झर झर उतरे । उदक उदक बूंद धानी चरे ॥  
नभ किरणों के संग हर्षित होकर आनंद उत्सव कर रहा है । पुत्र जनम का समाचार सुनकर पक्षी वृक्ष के खोल में चहचहा उठे । झरने से निकलने वाली नदी से पानी झर झर कर बह रहा है बुँदे आनंदतिरेक से उचक कर जलधानी अर्थात कुम्भ में चढ़ जा रहीं हैं ॥ 
  
सुनि सुमन कानन कानन नंदन नंदन घोस । 
बार फेरे कंचन कन खुरे नियति के कोस ॥ 
उद्यान के कुसुम ने जब पुत्र का रुदन रूपी हर्षनाद सुन कर हर्षित हो उठे । प्रकृति ने भी अपने  धनकोष खोल कर ओस रूपी स्वर्ण कणों की वार फेरी की ॥ 

बुधवार, ०६ मार्च, २०१३                                                                                        

कल कमल चपल धवल निराला । लख जननी मुख मंडल लाला ॥ 
दाने दयन निवेदन बोधे । करत बिनत मुख लेप अबोधे ॥ 
कमल के समान सुन्दर चंचल बालक के अलौकिक गोरे  मुखड़े को माता निहार रही है । शिशु  दयनीय आँखों से मुख में भोलेपन का लेप कर दाना देने हेतु विनती करते हुवे निवेदन करता है ॥ 
        
बाल ससी सम सिसु के लीला । राग कपोल कल कासि कीला ॥ 
रुदनानन सिर धरनि उठाई । मधुधर हँसि जननी मुसुकाई  ॥ 
शिशु की लीलाएँ बाल चन्द्रमा के समान है । गालो की लाली मानो प्रकाश का स्तम्भ हैं ॥ रो रो कर उसने धरती को सर पर उठा लिया है । शिशु की एई क्रीडाओं को देखकर माता की हँसी और मुस्कान मधुरता लिए हुवे है ॥ 

उमर घुमर इब उद भार रहे । जलकन झलकन धर गगन गहे ॥ 
जलकन कुम्भन गहनहि जैसे॥ स्तन पयोधन बंधन ऐसे ॥ 
जैसे बादल उमड़ते घुमड़ते हैं और जल के कण को धार गगन में गहराते हुवे दिखाई देते हैं ॥ जैसे कुम्भ में जल कण ग्रह किये होते है ऐसे ही अमृतजोड़ स्तनों में बंधा है ॥ 

अमिष क्षुधा भर पयस पिपासे । पद कर बिचर भुजंतर रासे ॥ 
लालन लोचन  ललचइँ लाखें । भूजन जनु  बरसन  ताकें ॥ 
शिशु, निश्छल भूख की कामना करते हुवे दूध का प्यासा है। हाथ पैर चलाता हुवा माता की गोद में क्रीडाएं कर रहा है । शिशु की आँखें लालच करते हुवे ऐसे  देख रही हैं जैसे धरती पर लोग वर्षा को तक रहें हों  ॥ 

स्तन गृह तट पान पयस स्तनँधय मंडल मुख । 
जनु बदरि बर दान बरस दे धान कर जन सुख ॥ 
स्तन धाम के द्वार को घेरे शिशु दुग्धपा कर रहा है । मानो बरखा  बूंदों का वर दान देकर मनुष्य जनों  को धान से वैभववान कर रही हो ॥ 

गुरूवार, ०७ मार्च, २०१३                                                                            

तात भ्रात कर महु लिए बधाए । ससुरार सुभ उदन्त पहुँचाए ॥ 
बाट बिटप चौहट ससुरारे । आजु अपर दै दरस दुआरे ॥ 
पिता  और भ्राता हाथ मन बधाई लिए वधु के ससुराल में पुत्र जन्म का शुभ समाचार दिए । सुसुराल की चौक चौबारे और उस पर का पेड़और घर का द्वार  आज कुछ अनूठे ही दिख रहे थे ॥ 

जानन यह बधु के मन तरसे । सुनि भए ताता पिय कस हरसे ॥ 
पर कहु सन कछु पूछ न पाई । भित भरि भरि रहि नैन झुकाई ॥ 
वधु का ह्रदय यह जानने को तरस गया कि पिता बनने का समाचार सुनकर पीया किस प्रकार हर्षित हुवे ।। पर किसी से भी कुछ पूछ नहीं पाई भरे हुवे अंतस से उसने नयन झुका लिए ॥ 
 दिवा बसु चरन  दु पहरि परे । पद अंतर भर सह  साँझि तरे ॥ 
दिसा अंत पर अम्बर साजे । आए दुनौ सथ सैल बिराजे ॥ 
सूर्य के चरण दोपहर को पार किये । सांझ भी उतर कर साथ चलने लगी ॥क्षितिज पर वेश विभूषित होकर दोनों पर्वत पर विराजित होकर बालक को देखने आए  ॥ 

नखत नेमि पथ मालै खचाए । नगन नग अनमोलक लाए ॥ 
रावचाव करे रयनिहि राए । पुत्र दरसन पर पिया न आए ॥ 
चन्द्रमा ने भी भ्रमण मार्ग से तारो की मालाओं में खचित नगण्य अनमोल रत्न  उपहार स्वरूप लेकर आए । रात ने भी छोटे से राजा के बहुंत लाड चाव किये । किन्तु पुत्र को देखने प्रियतम नहीं आए ॥ 

लख अपलक पलक बिछाए प्रीतम पंथ निहार । 
अलक राग रत गहराए निरख निरख गै हार ॥  
पलकें झपकाए बिना पलक पावढ़े बिछाए वधु प्रियतम की प्रतीक्षा करती रही रात काले रंग में गहराती गई और वधु प्रतीक्षा करती रही ॥ 

शुक्रवार, ०८ मार्च, २०१३                                                                                           

कवनु बिबस को कारन जाने । जान मनिक अहेतु अभिमाने ।। 
को अंकुस को बंधन रोके । निठुर पिया निज जात न लोके ॥ 
ऐसी कौन सी विवशता थी जाने क्या कारण था ।  समझदार होकर भी अकारण ही अभिमान किये हुवे है थे ॥ कौन सा बाधा थी काऊ से बंधन रोक रहे थे कि निष्ठुर प्रियतम अपने ही जातक को देखे नहीं आए ॥ 

नयन नीर बधु कंठ भरि लाइ । पयोधि परस पै पावस पाइ ॥ 
मुखरित मुख मन मान मलाना । निरखें पुत्र न जीउ किमि माना ॥ 
 नयन में आँसू वधु के गले में भर आये  मानो  सागर को स्पर्श करके बादलों में जल भर गया हो  ॥ मन के मुख पर वेदना छा गई और वह शब्दायमान  होकर कहने लगा कि पुत्र का मुख देखे बिना पिता कैसे रह गए ॥ 

जरन सुभाऊ काठि कठोरे । अहं कर आह  हर हिय तोरें ॥ 
चल सक नहिं का चारहि चरना । अजहुँ बास बधु भए पितु घर ना ॥ 
पिटा का स्वभाव संताप देने वाला और लकड़ी के जैसे कठोर है  ह्रदय को हरण कर हाय उसे अहंकार के कारण तोड़ रहे हैं ॥ पुत्र का मुख देखे के लिए क्या वह चार चरण भी चल ना सके । अब तो वधु का वास पिता  के घर में नहीं  है अर्थात उसका वास सूतिकागृह में है ॥  

बिरह बयस बधु सजन सुरताइ । लखतइँ बाले बदन बिसराइ ॥ 
जनि मुख पेम रस रासन पाए ।  चित निस्चित सिसु सयनै सुहाए ॥ 
विरह की अवस्था में वधु प्रियतम को स्मरण करती है । कितु जैसे ही बालक का मुख देखती समर भूल जाती है ॥ मुख से जाने का प्रेम रस का आनंद प्राप्त कर बालक निश्चिन्त होकर सोता हुवा  बहुत ही भला लग रहा है ॥ 

मंजुल मुकुलित नयनन कैसे । कोमलि कमलिन कलि के जैसे ॥ 
उसके सुदर अधमुँदे नयन कैसे है जैसे कोमल कमल की कलि के ही नयन हों ॥ 

जनक जननी बैर पड़े पुत्र सन कैसन बैर । 
पुरुख मान द्वेष तरे धरनी पड़े न पैर ॥ 
फिर वधु का मन मुखरित होकर कहने लगा पालक का आपस में बैर होता है पुत्र के साथ कैसा बैर । पुरुष का पुरुषत्व जब दवश पर उतर आता है तो वह आपे में नहीं रहता ॥ 

शनिवार, ०९ मार्च, २०१३                                                                                     

निंद नैन जे परे धराई । सपदि पद नैन पट तर आई ॥ 
पद चापत बसि भवन अटारी  । बोझिल बधु दै पाटि दुआरी ॥ 
जो नींद नयनों से परे धरी हुई थी वह तुरंत ही अयन पटल पर पेर रखती उतर आई ॥ पद संचालन करते हुवे नींद नयनों के  भवन खंड में वासित हुई तो वधु ने भवन कपाट को बंद कर दिए  ॥ 

 आखरी कंठ कर  उत्कासे । इत उत  चितबत  चरन नियासे ॥ 
अगुवन अगंतु  सपन सलोने । कलपन दरसे दोनौ लोने ॥ 
इधर नींद ने उच्चारण करने हेतु जैसे ही गला खखाते हुवे  इधर उधर देखते चरण उद्धृत किये ।  सुन्दर स्वपन ने अतिथि का आगे बढ़ कर अभिनन्दन किया । सुसज्जित हुवे दोनों बहुत ही सुशोभित हो रहे थे ॥ 

निंद बधु रूप ते सपन पियाए । प्रिय संगमन उर लवन दिठाए ॥ 
प्रनय कोपि तज बाहु  प्रसारे । अरस परस कर सूतक धारे ॥ 
नींद वधु के रूप में थी और स्वपन पिया के स्वरूप में थे । प्रिय का यह सयोग हृदय को अत्यत ही प्यारा लग रहा था ॥ प्रणय कलह के कारण वश रूठे पिया कोप को त्याग के भुजाओं को फैला कर प्रसारित कर आलिगा करते हुवे प्रेम के बंधन में ब्वान्न्ध लिया ॥ 

रसित लसित मुकुलित मुद  नैने । प्रिय कर रूप बर बदने बैने ॥ 
नैन कंज कन रागिन घुल कै । परस चरन पी धरनिहि ढुल कै ॥ 
आनंद निमग्न होकर मुदित हो नयन  अधमुंद हो गए ।  और प्रिय से हर्षयुक्त, मधुरित एवं सुन्दर वचन कहने लगे ॥ नैनो के अश्रु स्वरूप अमृत कण अनुराग में घुल कर धरा पर ढुलक आए और प्रिय के चरणों को स्पर्श करने लगे ॥

नीर नैनन कंचन कन, पलक कपोलक पोर । 
पिया सपन प्रपंचन धन, कास कलस कर जोर ॥ 
स्वप्न में प्रकट होने वाले संसार में पलकों के छोर से कपोल पर के अश्रु स्वरूप स्वर्ण कणो को पिया ने हथेली में बंद कर सचित कर लिया ॥ 

रविवार, १० मार्च, २०१३                                                                                          

खंड सयन सन सपन बिसमाए ।  छितरत छिन भिन लवन कन पाए ॥ 
आह अहन अहो रतन दरसे  । मुख कांति कमल किरन परसे ॥ 
निद्रा खंडन के सह  स्वप्न भी विखंडित हो गए । और उन  सुन्दर कणों को वधु ने छिन्न- भिन्न स्वरुप में छितरे हुवे पाया आह ! दिवस हुवा और सूर्य  का साक्षात्कार हुवा  । वधु के कमल जैसे कांति युक्त मुखड़े को उसकी किरणो ने स्पर्श किया ॥ 

रुदन राग कल रवनै काने । कहत बछुवन मइ दौ ना दाने ॥ 
सिसु अधरं धर सुधा आधारे । रस के कन कन  कंठ उतारे ॥ 
रोने की मधुर राग ध्वनि कानों में शब्दायमान हो उठी ।  मानो रोते हुवे वह कह रहा था हे माता ! मुझे भोजन दो ॥ फिर बालक ने सुधा के आधार पात्र को अपने अधरों पर रखते हुवे प्रेमरस की बूंदें  कंठ में उतरती  चली गई ॥ 

सुख सुधा  भर पूरित  बिहिते  । रद आछद  रस रसमस  लिहिते ॥ 
मुख पटल पाटल बरन पिहिते । पै पयसन नयन नींद निहिते ॥ 
 वधु के वक्ष में सुख की सुधा भरपूर निर्मित हो रही थी । शिशु के होंठ ने चाटते हुवे प्रेम रस का स्वाद लिया ॥ ( तृप्त होने  के पश्चात) मुख पटल,  गुलाबी रंग से आच्छादित हो गया  । और पयस पीने के पश्चात बालक की आखों में नींद  भर गई ॥ 

दिसत मुख माइ  ममताई । मुद्रित मोहित मनोहरताई ॥ 
मुख सोभित किमि बाल मुकुंदा । जिमि बर बाल मुकुल अरविंदा ॥ 
माता सोते हुवे शिशु के मुख को  ममता से परिपूर होकर निहारने लगी ।  उसकी मुख मुद्रा मोहित करने वाली और मन को हरने वाली थी । बालक का मुख कैसे सुशोभित हो रहा था मानो कोई सुन्दर कमल की अधखिली कलि हो ॥ 

अलि बल्लभ अलि अलक अलीके । लाल ललामन लावन लीके ॥ 
दोइ पद रेड अछद  छबि भोरी । मृदुल मुकुल तुल रंगत रोरी ॥  
बालक के माथे पर झुलते बाल,  लाल कमल पर भँवरे के समान  दिखाई दे रहे थे । माथे की रेखा- चिन्ह बालक के मुख में सुन्दरता भर रही थी । भोली छवि  से युक्त मुख पर  अधर के दो पद, कलि की कोमल पंखुडियो  के समान लाल-लाल थे  ॥ 


बाल कल बल अंग प्रत्यंगे  । गगन गमन जनु बाल पतंगे । 
चारु चरन कर कोमल कैसे । कलि कल के दल कोपल जैसे ॥ 
बालक के समस्त अंग अवयव सुदर स्वरूप लेकर ऐसे वलयित थे जैसे कि आकाश में किरो से वलयित होकर सूर्य का उदय हो रहा हो सुन्दर कोमल पैर और हाथ कैसे थे जैसे कलि के पल्लवित दल कोमलता लिए हुवे  होते हैं ॥ 

चरन  कर करन बर रंग नयनन कूटक गोल । 
लाल भाल बाल बिहंग कपूर गौर कपोल ॥ 
हाथ-पैर, का आदि सभी अग श्रेष्ठ वर्ण के थे आँखों की पुतलियाँ काले राग की थी । बालक का माथे पर मानो सूर्योदय हो रहा हो 
और गाल कर्पुर के समा गौर वर्ण के थे ॥ 

 अंक अंक अँख अंकुरित अंकुर अंग दुआर । 
अपूरब दर्सन रूप कृत अंग अंग रस सार ॥  
सभी अंग प्रत्यंग समस्त देह पर आँख खोलते हुवे अंकुरित हो रहे थे । बालक के इस रूप का दर्शन रूप अद्वितीय था । अंग अंग 
रस अर्थात बल युक्त थे ॥ 

सोमवार, ११ मार्च, २०१३                                                                                         

दै गौ ग्रासन गोदन ठोटे । धरी आँचर पोंछि कर होंठे ॥ 
उय गमनै करमन नित कारे । गर्भ जनन तन लाग न भारे ॥ 
गोद में भरे बछड़े रूपी बालक को गाय अवरूप माता ने भोजन दिया और अपने आँचल से उसका मुख पोछ कर प्रात : के नित्य कार्य करने हेतु चली गई । प्रसूति के पश्चात अब तन भारी नहीं लग रहा था  ॥ 

कहँ भावज लौउ न आहारे । असन अंगन सनेह सारे ॥ 
प्रसूति प्रासन  प्रास बिमूखे । भवज मनुहर रख धरे मूखे ॥ 
भावज कहती आहार लो आहार अंग को बल देता है और सुधा भी उत्पन्न करता है ॥ किन्तु प्रसूति भोजन करने से मना कराती 
क्योंकि वह भोजन बड़ा विचित्र था  और भावज मान मनुहार कर मुख पर रख देती ॥ 

भै दुइ पहरी सूर चढ़ आए । गगन गमन बहुस ताप बढाए ॥ 
देइ पी के पद चाप सुनाए । कुँवरहु ममतै बँध चले आए ॥ 
दोपहर हुई सूर्य शिखर पर चढ़ गया गगन में विचरता वह ताप को बहुत ही बढ़ा रहा था । इतने में ही पिया के पदचाप की ध्वनि सुनाई पड़ी । पिया  बालक के मोह में बांध कर चले आए ॥ 

मोह्कारिनि बहु खेरि खेरे । पाद पास पूरन लय घेरे ॥ 
जिन के आवनु आस न पैठे । नत सिस सन्मुख आसन बैठे ॥ 
यह मोह माया भी बहुत खेल करती है । बेदी में बाँध कर पूरा घेर लेती है ॥ जी के आने की कोई आस नहीं थी वे ही शीश झुका कर 
सामने बैठ थे ॥ 

बैसे नवन नयन सजन ललचहि लालन लाढ़ । 
जस कोउ महराउ रजन अहम् सिहासन छाढ़ ॥ 
नयन झुका कर बठे हुवे प्रियतम लाड-चाव हेतु ऐसे ललायित हैं । जैसे कोई राज्य का महाराजा अपना अहंकार रूपी सिंहासन का त्याग कर दिया हो ॥ 

मंगलवार, १२ मार्च, २०१३                                                                                                

निरख बधु प्रिय मन महँ मुसुकाए । लेइँ भावज सिसु गोदि धराए ॥ 
भुज अंतर पितु चितबत चीते । नव जात चरित चित हर जीते ॥ 
प्रियतम का ऐसा स्वरूप  देखकर वधु मन में मुस्कराती हैं । और भावज शिशु को लेकर प्रियतम की गोद में दे देतीं हैं ॥ शिशु को भुजाओं में धारण कर पिता उसे स्तब्ध होकर निहार रहे हैं । उस नवजात के चरित्र ने पिता के मन को हरण कर उसे जित लिया ॥ 

पाद पदुम पद अरुनै पोरे । पाल लोकनु कर पलने पोढ़े ।।
हँकरत हलरत अरु नख मेलें । अरस परस पितु सिसु सन खेलें ॥ 
बालक के चरण कमल के सदृश्य है और चरणों की उंगलियाँ अरुणाई लिए है । शिशु को हंकारते और हिलोरे देते पिता उसके आँख-नाक़ से स्वयं का मेल करते हुवे पिता शिशु को अंक में लिए क्रीडा करते सुशोभित हो रहे हैं ॥ 

तात करज सिसु कर गह धारे । का रे कह घरि घरि पुचकारें ॥ 
कभु मुँदरित पट नयन उघारे। कभु उघरित सिसु पाट दुआरे ॥ 
जब शिशु ने पिता की उँगलियों को हाथों में पकड़ लिया तब क्या रे! क्या रे! कहते हुवे बार-बार उसे पुचकारते हैं ॥ शिशु कभी तो मूंदे हुई आँखों को खोल लेता है कभी खुली हुई आँखें बंद कर लेता है ॥ 

पुत पितु मीलन अति सुखदाई ।  देखि दिरिस मूदित भइ माई ॥ 
जब पी सन रय नयनन राँचे । बधु कछु कही न पी कछु बाँचे ॥ 
पिता -पुत्र का यह मिलन अति सुख दाई है । इस दृश्य के दर्शन प्राप्त कर माता अति प्रसन्नचित है ।। और जब नयन प्रियतम के साथ संयुक्त होते हैं । तब न वधु कुछ कहती हैं न प्रियतम से कुछ कहते बनता है ॥ 

दुनौ बरत बिरह मह जस दीपक बर्ति प्रसंग । 
तरस दोनौ अरस परस एक दूजन के संग ॥      
दोनों दीपक और वर्तिका के प्रसंग, विरह अग्नि में जल रहे हैं, परस्पर आलिंगन और संग प्राप्त करने को दोनों ही तरस रहे हैं ॥ 

बुधवार, १३ मार्च, २०१३                                                                                      


कबहुक बधु कभु दरस दुलारे। सुख सम्पद नेह न्यौछारे ।। 
दुइ बानिक अनुराग मिलीते । कहि न सकै बुध बिदित भनीते ।। 
कभी वधु को तो कभी पुत्र को देखते हुवे सुखराशि और स्नेह को न्यौछावर करते ॥ दो रीति का जो अनुराग समिश्रित था उसका वर्णन प्रख्यात कवी भी नहीं कर सकते ॥ 

अजहुत रहिं दुइ जुगतहि जोटे । करत बाल किर्या बहु खोटे ।। 
तात मात बन भयउ तिगाढ़े । गहस्त के करतब अरु बाढ़े ।। 
नटखट बाल क्रियाएं करते हुवे अभी तक वर-वधु दो ही थे । अब वे पालक बन कर तीन हो गए और उनकी गृहस्थ से सम्बंधित कर्त्तव्य और अधिक बढ़ गए ॥ 

सार बचन अस कहा बुझाई । सैन सकुचित कहि भौजाईं ।। 
गुनत सुनत अस  बोल बतियाए । अरु तनि बेरि महँ सजन सिधाए ।। 
ऐसे सार वचन कह कर, संकेत पूर्ण वाणी में संकोचित भाव से भावजों ने समझाया ॥ इस भाँति श्रव्य वचनों से ज्ञान लेते प्रिय वार्त्तालाप में व्यस्त रहे और किंचित समय के पश्चात प्रस्थान किये ॥ 

चले नयन पट पीछइ पीछे । भए ओझर ते बधु पग खींचे ।। 
निठुर पिया पुनि लेइ न सोरे । तब के गवने फिर न बहोरे ॥ 
वधु के नयनों के द्वार पट प्रियतम के पीछे पीछे चले और जब प्रिय ओझल हुवे तब पट के चरण वापस हो लिए ॥ निष्ठुर प्रियतम ने फिर वधू की सुध नहीं ली । उस दिन के गए फिर वो वापस नहीं आए ॥ 

छठी के राउ राज मह फाटे फाटे टाँक ।
पुनि बिरहा अवसाद सह भइ बधु छड़ी छटाँक ।। 
प्रीत संपति का जन्म से ही दरिद्र राजा का शासन था । अत: अपने फटे हृदय को टांका लगाना ही उचित था । और फिर ऐसे फटे ह्रदय को धारण किये वधु विरह के अवसाद में पुन: एकांकी हो गई ॥ 

अम्बर अम्बर ढांक के बीते दिन कुल पाँच । 
आई चुनर नख टाँक के छठी लालन राँच ।।   
आकाशों को पार कर पांच दिवस चले गए । और फिर लाल रंग में अनुरक्त चुनरी में रत्न टांक कर लल्ले की छठी आई ॥ 

गुरूवार, १४ मार्च, २०१३                                                                                                  

औषध सदन दिन पाचम पूरे । छठी दिन सब जन भवन बहुरे ॥ 
आवतहि नव जात अन्हवाए  । सुखद सलिल सिस सरीर सुहाए ॥ 

ललन बसन लख लवनित लाले । कंचन खन घन घुंघरुहु घाले ॥ 
कूर कुसुम कहुँ कलि कलियाई । कनक कला करि कारू कलाई ॥ 

झन झन झगुलन झालरी झुरे । झौंर झौंर चार चंचरी फुरे ॥ 
दूर दूर दुइ धारी धारे । कलित कलापक कंठ कगारे ॥ 

चौतनि ऊपर फुंदरि लटके । चारु भेस अस अँख जा अटके ॥ 
सुन्दर झाबर जोर सँवारे । रूपांकन धर रूपब सारे॥ 

नभ केतु कर कुमकुम दै काजर रैनी कार । 
बड़ा लावन सुम सुम लै सजी सिंगारि थार ॥   

शुक्रवार, १५ मार्च, २०१३                                                                                                              

ललन गोदि लै पट पहराई । मुद भौजाई मंगल गाई ॥ 
अभरित लावा लोकन कैसे । दिब्य बसन मनि रतनन जैसे ॥ 

नैन करज कर काजर घीरे । जनु अम्बर घिर घन गम्भीरे ॥ 
केस भंवरिहि भर घुँघरारे । अह केसव कह माए सहारे ॥ 

कहुँ कल कुंचित कुण्डल कारे । जनु को कुंडनि डोरे डारे ॥ 
कट कन पाछे तुर धरि बिंदे । लखत बदन जनु  अलि अर्बिंदे ॥ 

तेजो रूप अस चौरस भाला । जस वर्धन कर तेजस लाला ॥ 
तेज तूल तुल लाखन रंगे । कुल दीपक धर तिलक नियंगे ॥ 

चाँद चकासित बदन प्रकासित छबि ऊरे ऊरे छितराए  ।  
छबिबत नंदन निरखत कानन फूर फुरे फुरे मुसुकाए ।। 
बसन ललन के बरन धरे कि ललन बसन के बरन भरे । 
अभरित अभरन वपुर्धरे कि अभरन अभरित वपुर हरे ॥  

मोल लइ मौली गाँठी रचि मल मंगल माल । 
पो सकल मंडल कांठी कंकनी घुँघरु घाल ॥ 

कंठी मनि श्री बलित कलित करधनी कल धौत । 
लखत ललन लौ ललित भए कंठ हिर हिरन मयी ॥